Prakriti Dharma

शिवा (कल्याणी) प्रकृति

“यह प्रकृति जो अत्यंत हीं रहमदिल और ममतामयी है।”

कई जगह कहा जाता है कि सृष्टि के आरंभ में क्या था? वहाँ कहा जाता है कि वहाँ एक था अर्थात् एक संख्या थी। क्यूँकि एक के आगे गिनती नहीं है। और कहा जाता है कि एक हीं आरंभ है जिसे जाना जा सकता है। 1 से पहले कोई संख्या नहीं है और उसे हीं ईश्वर कहा जाता है। जिससे पहले संख्या नहीं है, सृष्टि नहीं है। लेकिन भारतभूमि की एक खास विशेषता है। यहाँ अपनी ज्ञान सीमा से भी आगे की संभावना को स्वीकार किया जाता है। प्रशंसा की जाती है। उसकी विशेषता को स्वीकार किया जाता है।  यहाँ पर 1 से पहले ‘शून्य’ है। यह उन संभावना को भी स्वीकार किया जाता है जो 1 से पहले भी है। यह अनंत संभावनाओं की जननी है। यहाँ ब्रह्म की व्याख्या की जाती है। यह ब्रह्म-प्रकृति है। 

यहाँ शिव स्वयं पूज्य होते भी इसी ब्रह्म की उपासना करते हैं। यही ब्रह्म सब में रम रहा है। इसीलिए इसे राम भी कह दिया जाता है। इस ब्रह्माण्ड का प्रतीक यह लिंग है। लिंग अर्थात चिह्न है। इसे शिवलिंग कहते हैं। यह जो ब्रह्माण्ड रूपी शिवलिंग है वह पिण्ड रूपी शिव में व्याप्त है। यह पिण्ड ब्रह्माण्ड से ही बना है। यह उसके गुणधर्म से बना है। यही यत् पिण्डे तत् ब्रह्माण्डे का सिद्धांत है। शिव की अनुभूति क्या है? शिव द्वारा की गई पूजा शिवलिंग है। शिवलिंग ब्रह्माण्ड की अनुकृति डिजाइन है। जो तत्व शिवलिंग में है वह शिव में है। दोनों एकरूप हैं। जैसा ब्रह्माण्ड है वैसे शिव हैं। शिवलिंग अग्नि-सोम से बना है। स्त्री और पुरूष तत्व से बना है। पिण्ड में स्त्री और पुरूष समाया हुआ है। यह सूक्ष्म तथा स्थूल दोनों रूप से बना है। यही शिव की अनुभूति है। यही शिव की पूजा है। यही कारण अर्द्ध-नारीश्वर होना शिव का वास्तविक स्वरूप है। अर्द्धनारीश्वर की अनुभूति हीं सच्ची शिवलिंग पूजा है। यही प्रकृति को आत्मसात् करना है। शिवलिंग का जल लाँघा या उपयोग में नहीं लाया जाता है। वह मिट्टी में हीं मिलता है अर्थात् सब कुछ प्रकृति में हीं मिलता है।

इसी ब्रह्माण्ड की शिवलिंग की सूक्ष्ंअ शक्तियाँ कुण्डलिनी के रूप में हम में व्याप्त है। जैसे चुम्बक के दो ध्रुव विद्युत ऊर्जा का निर्माण कर देते हैं। वैसा ही शिवलिंग भी प्रतीक मॉडल है। अत: इनके चैतन्य होने पर हमारे भीतर जगत के ज्ञान के चैतन्य होने पर हमें अनंत ज्ञान, शक्ति और वीर्य(पराक्र्म) की उत्पत्ति होती है। असीम आनंद की उपल्ब्धि होती है। और साधक शिवरूप होकर स्वयं श्रीयंत्र बन जाता है। जहाँ षट् चक्रों वाला शरीर सहस्रार से जुड़ कर ऊपर नीचे के चार-चार त्रिकोणों से बढ़कर पाँचवे त्रिकोण पाँचवें शरीर से जुड़ जाता है। आरोह-अवरोह की समता/चक्र प्राप्त कर लेता है। तृष्णा का क्षय अत्यंत महत्वपूर्ण है। तृष्णा के क्षय होने पर भक्ति जागृत होती है। अस्तित्व के प्रति भक्ति जागृत होती है। यह सर्वव्यापी राम तत्व को समझ पाती है। अन्यथा तृष्णा हमारे शक्ति को किसी न किसी एक चक्र के वासना में बाँध देती है और एक जगह शक्ति का रूकना जरूर कहीं न कहीं बाँध तोड़ कर हानि पहुँचाता है। भाव में, विचार में या कर्म में हमें हानि पहुँचाता है। कबीरदास ने इसीलिए हमें दशरथ पुत्र से बढ़कर सबमें रमने वाली ब्रह्माण्ड शक्ति की भक्ति सिखायी। राम सबमें रम रहे हैं। कृष्ण कण-कण में व्याप्त हैं। आज जरूररत है तुलसीदास के असली सर्वमंगलकारी दृष्टि को समझा जाये। तुलसी ने दशरथ पुत्र में ब्रह्म नहीं कहा है बल्कि ब्रह्म हीं इस राम रूप में रम रहे हैं। और वे सिर्फ राम में हीं नहीं हैं सब में रम रहे हैं। इसीलिए यह संपूर्ण जगत हीं शिव की अर्द्धनारीश्वर भाव की तरह ‘सीयाराम मय सब जग जानी’ है। वे इस भावना  को महत्व देते हैं। इसीलिए रूप बदले प्रकृति में तुलसी भगवतीय गुण को कभी तिरोहित नहीं होने देते। यह हमें विश्वदृष्टि देती है जो समन्वयकारी है। 

सौरभ कुमार 


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