Prakriti Dharma
सनातन धर्म की ग्लोबल (वैश्विक) व्यवस्था और प्रकृति धर्म उपासना
सनातन धर्म की ग्लोबल (वैश्विक) व्यवस्था और प्रकृति धर्म उपासना
सनातन धर्म प्रकृति परक है। यहाँ आत्मा की उपासना भी प्रकृति के अन्य तत्व के साथ मिलाकर हीं होती है। क्योंकि आत्मा सर्वदा निरपेक्ष नहीं होती है। क्योंकि यह भी प्रकृति का हीं उपादान है। यहीं कारण ध्यान में एकाएक आत्मा और परमात्मा की अनुभूति नहीं होती। यहाँ धारणा से होती हुई ध्यान और फिर समाधि होती है। समाधि निर्वाण हो जाती हैं। श्वास को देखते हुए, काया को महसुस करते हुए, चित्त को देखते हुए हम समाधि तक पहुँचते हैं। यहाँ एक तल्ले से दुसरे तल्ले की कूद नहीं है। एक से दूसरे में मिली हुई गति हैं। इसलिए शरीर यहाँ क्षणभंगुर तो है त्याज्य नहीं है। शरीर धर्म का साधन है। शरीर को स्वस्थ रखना भी धर्म का मार्ग है। इसलिए यहाँ ध्यान है तो योगासन (विभिन्न शैली के व्यायाम) भी है। जैसे हर जमीन अपने गुण से अलग-अलग जीवन देती है वैसे हीं सनातन धर्म की ग्लोबल (वैश्विक) व्यवस्था में अलग अलग पसंद से रचना होती है। जैसे प्रणाम को हीं ले तो सनातन धर्म में प्रणाम का अपना महत्व है। प्रणाम करना नमन करना है। इसे दोनों हाथ मिलाकर करते हैं इसे दोनों हथेली मिला कर करते हैं जिसमें बायें हाथ की अंगुठा को दायें हाथ की अंगुठा से मिलाते हैं बाकी अंगुलियों से दूसरी बाकी उंगुलियों को मिलाते हैं। पाँच उंगलियाँ पाँच तत्व की प्रतीक हैं। अंगूठा मनस्, बुद्धि और आत्म तत्व का प्रतीक है। इसलिए इसे मिला देते हैं। सिर को झुका देते हैं। सिर को झुका अपने अहं को गिरा देते हैं। अहं विस्तृत में मिल जाता है। ब्रह्म में खो जाता है। पाँच तत्व से मिली हुई पूजा अहंकार के गिरने से हीं संपूर्ण हो जाती है। यह एक व्यवस्था है। यह एक तरह की गति है। नमन की दूसरी गति है जिसमें दोनों हथेली को खोल कर मिलाते है जिसमें अंगूठा दोनों तरफ बाहर की ओर होता है और छोटी उँगली आसपास सटी होती है। इसे सुबह के समय आमतौर पर करतल (हथेली) दरसन के लिए लाया जाता है। इसे काफी पुण्यप्रदायक माना जाता है। कई जगह इसे नमाज में उपयोग में लाया जाता है। उसी तरह से कोई समव्यस्क मिलता है तो हाथ मिलाने में दूसरे के हाथ को अपने हाथ में लिया जाता है। विवाह के समये कन्यादान में भी एक हाथ को दूसरे के हाथ में लिया जाता है। संस्कृतियाँ मिली जुली हीं होती है। भारत में विवाह के अवसर पर दोनों जगह के धान को मिलाने की रस्म करते हैं। जब दिल नहीं मिले होते हैं तो हीं सवाल पैदा होता है। जब दिल मिले होते हैं तो सवाल पैदा नहीं होता है। इसे इस रूप में भी समझ सकते हैं कि वहीं संस्कृति जीवित रहती है जो समन्व्यशील होती है। ब्रह्म सगुण साकार-निराकार है। नाद-बिंदु है। इसे और आसानी से समझ सकते हैं जब हम सगुण-निराकार की उपासना करते हैं तो यह इस्लाम के करीब हो जाती है और यह जब सगुण-साकार की उपासना करते हैं तो यह ईसाईयत के करीब हो जाती है। जब हम समग्र रूप से उपासना करते है यह शक्ति की नाद-बिदु, आरोह-अवरोह, लीला-प्रलय हो जाती है। यहाँ योग से भी ब्रह्म तक पहुँचते हैं और भक्ति से भी ब्रह्म तक पहुँचते हैं। कई बार एक से दूसरी भावभूमि का गमन करते हैं।
सनातन धर्म प्रकृति परक है। यहाँ आत्मा की उपासना भी प्रकृति के अन्य तत्व के साथ मिलाकर हीं होती है। क्योंकि आत्मा सर्वदा निरपेक्ष नहीं होती है। क्योंकि यह भी प्रकृति का हीं उपादान है। यहीं कारण ध्यान में एकाएक आत्मा और परमात्मा की अनुभूति नहीं होती। यहाँ धारणा से होती हुई ध्यान और फिर समाधि होती है। समाधि निर्वाण हो जाती हैं। श्वास को देखते हुए, काया को महसुस करते हुए, चित्त को देखते हुए हम समाधि तक पहुँचते हैं। यहाँ एक तल्ले से दुसरे तल्ले की कूद नहीं है। एक से दूसरे में मिली हुई गति हैं। इसलिए शरीर यहाँ क्षणभंगुर तो है त्याज्य नहीं है। शरीर धर्म का साधन है। शरीर को स्वस्थ रखना भी धर्म का मार्ग है। इसलिए यहाँ ध्यान है तो योगासन (विभिन्न शैली के व्यायाम) भी है। जैसे हर जमीन अपने गुण से अलग-अलग जीवन देती है वैसे हीं सनातन धर्म की ग्लोबल (वैश्विक) व्यवस्था में अलग अलग पसंद से रचना होती है। जैसे प्रणाम को हीं ले तो सनातन धर्म में प्रणाम का अपना महत्व है। प्रणाम करना नमन करना है। इसे दोनों हाथ मिलाकर करते हैं इसे दोनों हथेली मिला कर करते हैं जिसमें बायें हाथ की अंगुठा को दायें हाथ की अंगुठा से मिलाते हैं बाकी अंगुलियों से दूसरी बाकी उंगुलियों को मिलाते हैं। पाँच उंगलियाँ पाँच तत्व की प्रतीक हैं। अंगूठा मनस्, बुद्धि और आत्म तत्व का प्रतीक है। इसलिए इसे मिला देते हैं। सिर को झुका देते हैं। सिर को झुका अपने अहं को गिरा देते हैं। अहं विस्तृत में मिल जाता है। ब्रह्म में खो जाता है। पाँच तत्व से मिली हुई पूजा अहंकार के गिरने से हीं संपूर्ण हो जाती है। यह एक व्यवस्था है। यह एक तरह की गति है। नमन की दूसरी गति है जिसमें दोनों हथेली को खोल कर मिलाते है जिसमें अंगूठा दोनों तरफ बाहर की ओर होता है और छोटी उँगली आसपास सटी होती है। इसे सुबह के समय आमतौर पर करतल (हथेली) दरसन के लिए लाया जाता है। इसे काफी पुण्यप्रदायक माना जाता है। कई जगह इसे नमाज में उपयोग में लाया जाता है। उसी तरह से कोई समव्यस्क मिलता है तो हाथ मिलाने में दूसरे के हाथ को अपने हाथ में लिया जाता है। विवाह के समये कन्यादान में भी एक हाथ को दूसरे के हाथ में लिया जाता है। संस्कृतियाँ मिली जुली हीं होती है। भारत में विवाह के अवसर पर दोनों जगह के धान को मिलाने की रस्म करते हैं। जब दिल नहीं मिले होते हैं तो हीं सवाल पैदा होता है। जब दिल मिले होते हैं तो सवाल पैदा नहीं होता है। इसे इस रूप में भी समझ सकते हैं कि वहीं संस्कृति जीवित रहती है जो समन्व्यशील होती है। ब्रह्म सगुण साकार-निराकार है। नाद-बिंदु है। इसे और आसानी से समझ सकते हैं जब हम सगुण-निराकार की उपासना करते हैं तो यह इस्लाम के करीब हो जाती है और यह जब सगुण-साकार की उपासना करते हैं तो यह ईसाईयत के करीब हो जाती है। जब हम समग्र रूप से उपासना करते है यह शक्ति की नाद-बिदु, आरोह-अवरोह, लीला-प्रलय हो जाती है। यहाँ योग से भी ब्रह्म तक पहुँचते हैं और भक्ति से भी ब्रह्म तक पहुँचते हैं। कई बार एक से दूसरी भावभूमि का गमन करते हैं।
सगुण ब्रह्म के साकार-निराकार को इस रूप में भी समझ सकते हैं। बिग बैंग थ्योरी से अगर साकार है तो ब्लैक होल थ्योरी से निराकारिता है। साकार-निराकार तो चलता रहता है। बिग बैंग से पहले भी तो कुछ था हीं। कबीर ने परमतत्व को राम कहा। सिर्फ दशरथ पुत्र के हीं होने का निषेध किया। लेकिन वह परमत्त्व में भी सगुण तत्व तो है हीं। हाँ सिर्फ इतना हीं है वह सगुण वैसा हीं है जैसा सतो-रजो-तमो से अतीत त्रिगुणातीत कहा जाता है। यह त्रिगुणातीत क्या है ये तीनों की साम्यावस्था से उत्पन्न अलौकिकता है। उसकी अपनी कोई इच्छा भले नहीं हो दयालुता तो है हीं। जैसे लाल-नीला-हरा मिलाकर श्वेत हो जायें। या सातो रंग मिलकर फिर सफेद हो जायें। आयुर्वेद में कफ-पित्त-वात असंतुलित हो जाये तो सन्निपात (त्रिदोष) रोग हो जाता है। तीनों संतुलित हो जाये तो आदमी स्वस्थ हो जाता है। स्वस्थ प्रकृतिस्थ होने को कहते हैं। कभी हमें किसी गुण को बढ़ाना होता है तो कभी बढ़े को घटाना होता है। कभी एक के बढ़े को दूसरे को बढ़ाकर संतुलित करना होता है। ये ऐसा हीं है जैसे लाल-नीला हो तो हरा डाले तो सफेद होता है। कभी नीला-हरा हो तो लाल के डालने से सफेद मिले। सफेद के लिए सफेद हीं डाल देने से अभीष्ट मिले ये जरूरी नहीं। साधक के दृष्टि से तो नहीं। क्योंकि साधक के भीतर अपना तत्व रंग भी तो होता है। सफेद हो तो सफेद डालने से सफेद हीं मिलता है। दूसरा रंग होने पर परमात्मा चाहे तो सफेद भी कर सकता है। हमारे समर्पण करने से ऐसा हो सकता है। क्योकिं वहाँ सिर्फ हमारे और परमात्मा हीं नहीं है। वह समुच्चय है। जहाँ सभी मिलकर सफेद हैं। वो हमारे भीतर गुण को बढ़ा सकते है तो अवगुण को घटा सकते हैं। उनमें अवगुण को गुण में बदलने की शक्ति है। तुलसी के राम हमेशा दोहरी भूमिका में रहे। विष्णु के अवतार और परमतत्व के बीच होने में। वहाँ परम तत्व और विष्णु में भी एक खास तरह का रिश्ता गढ़ने की तुलसी ने कोशिश की। ऐसी हीं कोशिश शैव परंपरा में की गई। भारत में राम-कृष्ण दोनों को विष्णु का अवतार माना गया। राम को हीं कृष्ण का अगला जन्म माना गया। जबकि दोनों में गुण साम्य नहीं है। मानसिक भूमिका एक नहीं है। यहाँ हरि और हर को भी एकरूप माना गया। यहाँ ऐसे सिद्ध भक्त भी हुए जिन्हें बंद आँखों से एक की मूर्ति में दूसरे के रूप की अनुभूति हुई। यह वस्तुत: एक ब्रह्म में विभिन्न उपास्य और उपासक में एक सूत्र में बँधे होने का संगीत है। संगीत में एक हीं सप्तक नहीं है। सुर घटने में भी अनंत हो जाते हैं। बढ़ने में भी अनंत हो जाते है। सीमा हमारे कानों की सुनने की है। उसी तरह रंग भी हैं। सीमा हमारे देखने की है। अति से बचते हुए मध्य का मार्ग या संतुलित मार्ग हीं सनातन होता है। मनुष्य के अवस्था के हिसाब से आश्रम और गुण के हिसाब से वर्ण (स्वभाव) बनते है। जब इसके हिसाब से समाज चलता है तो परतंत्रता नहीं आती। गृहस्थ आश्रम सारे आश्रम का मूल है। इसके टिकने से ही समाज टिकता है। आज अगर भारत में वैलेनटाईन का महत्व बढ़ा है तो इसे प्रेम की स्वच्छेगामिता मत समझिये। यह प्रेम को श्रेय (कल्याण) में बांधने का उत्सव समझिये। आगे चलकर यहाँ का प्रेम एक स्थायित्व खोज हीं लेगा। भारत के समसे बडे नायक शिव और राम अपने प्रेम को श्रेय (विवाह) में बांधकर हीं भारत के सबसे बड़े नायक बने है। वे हमारे गृहस्थ आश्रम के सबसे बड़े नायक हैं। उनके विवाह को तुलसी ने पार्वती-मंगल और जानकी-मंगल कहा है। कृष्ण ने भी राधा के साथ गंधर्वविवाह किया हीं था। राधा कृष्ण की स्प्रीटियुल पार्टनर तो ब्रज में समादृत है हीं। पहली आयु के साथ व्यक्ति जीवन के एक आश्रम (भूमिका) से दूसरे आश्रम (भूमिका) में प्रवेश करता था। अब उनका कभी-कभी अतिक्रमण कर दिया जाता है। अध्यात्म के विकास और सोपान के लिए प्रेम और वात्सल्य जरूरी है। भारत में यूँ हीं प्रेम को परम पुरूषार्थ नहीं माना गया है। यह संतुलित होकर हीं मुक्ति देता है। विवेकानंद ने जब अमेरिका में एकाएक वहाँ के युवाओं को ध्यान कराया तो एकाएक उनके भीतर ‘काम’ की इच्छा भी बढ़ गयी। एक छोर को खीचेंगे तो दूसरा छोर भी खींच जाता है। जब सात चक्र संतुलित हो तभी सामरस्य है। यहाँ योग करने से सिद्धि तो मिलती है। पर सिद्धि के लिए योग करने की मनाही है। सिद्धि पाना लक्ष्य नहीं होता है। आत्मज्ञान द्वारा खुद को विस्तृत करना हीं ल्क्ष्य होता है। यहाँ साधक भेद से सिर्फ प्रार्थना करना भी पर्याप्त होता है तो विश्व कल्याण हेतु प्रकृति को संतुलित करने हेतु हवन करना भी कर्तव्य हो जाता है। पूजा किसी की भी की जाए वह संपन्न प्रकृति के द्वारा हीं होती है। जब जातक के तीनो लग्न में संतुलन हो तभी सामरस्य आता है। नहीं तो घटाने-बढ़ाने का वैश्विक चक्र चलता रहता है।
सगुण ब्रह्म के साकार-निराकार को इस रूप में भी समझ सकते हैं। बिग बैंग थ्योरी से अगर साकार है तो ब्लैक होल थ्योरी से निराकारिता है। साकार-निराकार तो चलता रहता है। बिग बैंग से पहले भी तो कुछ था हीं। कबीर ने परमतत्व को राम कहा। सिर्फ दशरथ पुत्र के हीं होने का निषेध किया। लेकिन वह परमत्त्व में भी सगुण तत्व तो है हीं। हाँ सिर्फ इतना हीं है वह सगुण वैसा हीं है जैसा सतो-रजो-तमो से अतीत त्रिगुणातीत कहा जाता है। यह त्रिगुणातीत क्या है ये तीनों की साम्यावस्था से उत्पन्न अलौकिकता है। उसकी अपनी कोई इच्छा भले नहीं हो दयालुता तो है हीं। जैसे लाल-नीला-हरा मिलाकर श्वेत हो जायें। या सातो रंग मिलकर फिर सफेद हो जायें। आयुर्वेद में कफ-पित्त-वात असंतुलित हो जाये तो सन्निपात (त्रिदोष) रोग हो जाता है। तीनों संतुलित हो जाये तो आदमी स्वस्थ हो जाता है। स्वस्थ प्रकृतिस्थ होने को कहते हैं। कभी हमें किसी गुण को बढ़ाना होता है तो कभी बढ़े को घटाना होता है। कभी एक के बढ़े को दूसरे को बढ़ाकर संतुलित करना होता है। ये ऐसा हीं है जैसे लाल-नीला हो तो हरा डाले तो सफेद होता है। कभी नीला-हरा हो तो लाल के डालने से सफेद मिले। सफेद के लिए सफेद हीं डाल देने से अभीष्ट मिले ये जरूरी नहीं। साधक के दृष्टि से तो नहीं। क्योंकि साधक के भीतर अपना तत्व रंग भी तो होता है। सफेद हो तो सफेद डालने से सफेद हीं मिलता है। दूसरा रंग होने पर परमात्मा चाहे तो सफेद भी कर सकता है। हमारे समर्पण करने से ऐसा हो सकता है। क्योकिं वहाँ सिर्फ हमारे और परमात्मा हीं नहीं है। वह समुच्चय है। जहाँ सभी मिलकर सफेद हैं। वो हमारे भीतर गुण को बढ़ा सकते है तो अवगुण को घटा सकते हैं। उनमें अवगुण को गुण में बदलने की शक्ति है। तुलसी के राम हमेशा दोहरी भूमिका में रहे। विष्णु के अवतार और परमतत्व के बीच होने में। वहाँ परम तत्व और विष्णु में भी एक खास तरह का रिश्ता गढ़ने की तुलसी ने कोशिश की। ऐसी हीं कोशिश शैव परंपरा में की गई। भारत में राम-कृष्ण दोनों को विष्णु का अवतार माना गया। राम को हीं कृष्ण का अगला जन्म माना गया। जबकि दोनों में गुण साम्य नहीं है। मानसिक भूमिका एक नहीं है। यहाँ हरि और हर को भी एकरूप माना गया। यहाँ ऐसे सिद्ध भक्त भी हुए जिन्हें बंद आँखों से एक की मूर्ति में दूसरे के रूप की अनुभूति हुई। यह वस्तुत: एक ब्रह्म में विभिन्न उपास्य और उपासक में एक सूत्र में बँधे होने का संगीत है। संगीत में एक हीं सप्तक नहीं है। सुर घटने में भी अनंत हो जाते हैं। बढ़ने में भी अनंत हो जाते है। सीमा हमारे कानों की सुनने की है। उसी तरह रंग भी हैं। सीमा हमारे देखने की है। अति से बचते हुए मध्य का मार्ग या संतुलित मार्ग हीं सनातन होता है। मनुष्य के अवस्था के हिसाब से आश्रम और गुण के हिसाब से वर्ण (स्वभाव) बनते है। जब इसके हिसाब से समाज चलता है तो परतंत्रता नहीं आती। गृहस्थ आश्रम सारे आश्रम का मूल है। इसके टिकने से ही समाज टिकता है। आज अगर भारत में वैलेनटाईन का महत्व बढ़ा है तो इसे प्रेम की स्वच्छेगामिता मत समझिये। यह प्रेम को श्रेय (कल्याण) में बांधने का उत्सव समझिये। आगे चलकर यहाँ का प्रेम एक स्थायित्व खोज हीं लेगा। भारत के समसे बडे नायक शिव और राम अपने प्रेम को श्रेय (विवाह) में बांधकर हीं भारत के सबसे बड़े नायक बने है। वे हमारे गृहस्थ आश्रम के सबसे बड़े नायक हैं। उनके विवाह को तुलसी ने पार्वती-मंगल और जानकी-मंगल कहा है। कृष्ण ने भी राधा के साथ गंधर्वविवाह किया हीं था। राधा कृष्ण की स्प्रीटियुल पार्टनर तो ब्रज में समादृत है हीं। पहली आयु के साथ व्यक्ति जीवन के एक आश्रम (भूमिका) से दूसरे आश्रम (भूमिका) में प्रवेश करता था। अब उनका कभी-कभी अतिक्रमण कर दिया जाता है। अध्यात्म के विकास और सोपान के लिए प्रेम और वात्सल्य जरूरी है। भारत में यूँ हीं प्रेम को परम पुरूषार्थ नहीं माना गया है। यह संतुलित होकर हीं मुक्ति देता है। विवेकानंद ने जब अमेरिका में एकाएक वहाँ के युवाओं को ध्यान कराया तो एकाएक उनके भीतर ‘काम’ की इच्छा भी बढ़ गयी। एक छोर को खीचेंगे तो दूसरा छोर भी खींच जाता है। जब सात चक्र संतुलित हो तभी सामरस्य है। यहाँ योग करने से सिद्धि तो मिलती है। पर सिद्धि के लिए योग करने की मनाही है। सिद्धि पाना लक्ष्य नहीं होता है। आत्मज्ञान द्वारा खुद को विस्तृत करना हीं ल्क्ष्य होता है। यहाँ साधक भेद से सिर्फ प्रार्थना करना भी पर्याप्त होता है तो विश्व कल्याण हेतु प्रकृति को संतुलित करने हेतु हवन करना भी कर्तव्य हो जाता है। पूजा किसी की भी की जाए वह संपन्न प्रकृति के द्वारा हीं होती है। जब जातक के तीनो लग्न में संतुलन हो तभी सामरस्य आता है। नहीं तो घटाने-बढ़ाने का वैश्विक चक्र चलता रहता है।
सौरभ कुमार