रस-ब्रह्म साहित्य संगीत

वरदान

मैं अपने खुले दो हस्त लिए

अकिंचन राह में खड़ा था।

सभी प्रसन्न मुदित खड़े

अपने-अपने ‘भाग’ हाथ में ले

सराहते ‘भाग’ में लिप्त थे।

परंतु मेरे वरदान की सीमा न रही

तुम स्वयं आ कर प्रकट हुए

मेरे दो खाली हाथ उस

समय भी तुम्हें प्रणाम

करने को प्रस्तुत थे।

तुम्हारे गले में डालने

वाली दो बाँह मेरे ही थे।


सौरभ कुमार


सृष्टि रसमय है। ब्रह्मांड रसमय है। अथातो ब्रह्म-जिज्ञासा का समाधान रस है। रस तो रस हैं। उनकी मात्रा और संयोग से वे हमारे अपने और हमारी मानवता और सारी सृष्टि में हीं अच्छे-बुरे बनते हैं। साहिय या संगीत उसी रस से परम ब्रह्म या परमानंद को पाने की अनुभूति है। इनका सृजन या आस्वादन या अध्ययन भी इस रूप में आवश्यक है।

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