रस-ब्रह्म साहित्य संगीत
अहंकार ईश्वर का आहार
अहंकार ईश्वर का आहार
सुना हूँ अहंकार ईश्वर का आहार होता है। सोचा सब लोग पौष्टिक आहार लेते हैं। भला ये ईश्वर को अहंकार लेने से, क्या पौष्टिकता मिलती होगी। इतना तो तय है आदमी को पौष्टिकता नहीं मिलती, क्षय हीं होता है। तो क्या ईश्वर के अहंकार का आहार करने से ईश्वर का क्षय नहीं होता। ईश्वर के अहंकार का लेना अस्तित्व की शुद्धि है। भारत की भाषा का रहस्य, उसकी कुंजी हमारे मिथक है। यहाँ समस्त आत्मा का योग परमात्मा यानि ईश्वर है। इसी लिए वह अंशी अपने अंश का शुद्धि कर खुद की हीं की शुद्धि करता है। और खुद हीं शुद्ध बुद्ध होता है।
सौरभ कुमार
सृष्टि रसमय है। ब्रह्मांड रसमय है। अथातो ब्रह्म-जिज्ञासा का समाधान रस है। रस तो रस हैं। उनकी मात्रा और संयोग से वे हमारे अपने और हमारी मानवता और सारी सृष्टि में हीं अच्छे-बुरे बनते हैं। साहिय या संगीत उसी रस से परम ब्रह्म या परमानंद को पाने की अनुभूति है। इनका सृजन या आस्वादन या अध्ययन भी इस रूप में आवश्यक है।
सृष्टि रसमय है। ब्रह्मांड रसमय है। अथातो ब्रह्म-जिज्ञासा का समाधान रस है। रस तो रस हैं। उनकी मात्रा और संयोग से वे हमारे अपने और हमारी मानवता और सारी सृष्टि में हीं अच्छे-बुरे बनते हैं। साहिय या संगीत उसी रस से परम ब्रह्म या परमानंद को पाने की अनुभूति है। इनका सृजन या आस्वादन या अध्ययन भी इस रूप में आवश्यक है।