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मानव के बालमन का प्रदूषण और ज्योतिषीय निदान 

आज के समय में प्रकृति में विकास और प्रदूषण दोनों साथ-साथ चल रहे हैं। इतने इलेक्ट्रॉनिक गैजेट जहाँ विकास को दर्शा रहे हैं तो इलेक्ट्रॉनिक कचरा (ई-कचरा) भी उतना हीं बढ़ा है। कचरे की निष्पादन की पूरी तरह से समुचित रूप से वृहत स्तर पर व्यवस्था नहीं हो पा रही है। विभिन्न तरह के रेडियेशन का शरीर पर खतरा अलग बढ़ा है। जहाँ कंटेंट का फैलाव और प्रसार हुआ है वहीं विचार तथा मन की कोमलता भी उतनी ही आहत भी हो रही है। आज के समय में प्रधानमंत्री भी बच्चे को आनलाईन गेम के खतरे से वाकिफ करा रहे हैं तो डॉक्टर और शिक्षा विशेषज्ञ भी बच्चों और छात्र को सावधान कर रहे हैं। आज का बालमन खतरे में है तो हमारा आनेवाला मानव भी वही है और वही खतरे में भी है। आज का बालक चौतरफा (चारो दिशाओं) के मुकाबले दसो दिशाओं से आहत प्रभावित हो रहा है। प्रकृति के पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु तथा आकाश सभी प्रदूषित है और प्रकृति के आकाश तत्व तो आज सबसे ज्यादा खतरे में है। जहाँ आकाश युद्ध का मैदान है तो संचार के साथ कई तरह के तत्व के आवागमन का माध्यम भी है। भाव-विचार का फैलाव का क्षेत्र भी यही है। पहले आकाश शांत था तथा मानव का बालमन भी शांत था। वह सादा तथा आस्थावान जीवन जी रहा था। आज हाथ में बहुत कुछ है। आज हृदय में लालसा बहुत है लेकिन आज के छोटे बच्चे आत्महत्या तक को भी सामान्य रूप से कर रहे हैं। आज उनके हृदय में प्रेम का स्वप्न लहराता है पर वह समुचित रूप से सम्यक (भली प्रकार) न होकर प्रवंचना हीं साबित होता है। संबंध टिकाऊ नहीं हो पा रहे हैं। लालित्य भाव खो रहा है। युवा के पास दौलत तो है पर वह मन से निर्धन भी होता जा रहा है। समाधान उसे नहीं मिल पाता है। नशा का चलन बढ़ा है। ध्यान के क्षेत्र में भी कुण्डलिनी जगाने के नाम पर वह अक्सर दिग्भ्रमित हो जाता है। 

आज प्रकृति के संसाधन के वितरण पर आगे चलकर मानव सभ्यता के संघर्ष की चर्चा चल पड़ी है। मानव जाति के लिए समाधान की खोज बढ़ी है क्योंकि आज का मानव खतरे में है। आज के समय में मन की फिसलन बढ़ी है।  देखना है तो आप पार्कों को देखिए और सिर्फ आज तक नहीं देखिए। रिपोर्ट चौंकाने वाले आ रहे हैं। नहीं तो मन की समस्या आज इतनी नहीं होती। निराशा, अवसाद, चिंता इतनी नहीं होती। आज जोश तो दिखता है पर उसके टिकाऊ होने की जरूरत है। एक प्रसिद्ध मिथक है- देवता, दानव और मानव प्रजापिता ब्रह्मा के पास अपने कल्याण के मार्ग जानने  के लिए गए तो उन्होंने तीनों को बारी-बारी से ‘द’ बताया। देवता ने अपने स्वभाव को देखते हुए ‘दमन’, मानव ने अपने स्वभाव को देखते हुए ‘दान’ तथा दानव ने अपने स्वभाव को देखते हुए ‘दया’ शब्द को ग्रहण किया।

यहीं पर ज्योतिष का आधुनिक महत्व आ जाता है। आज एक प्रकृति धर्मी ज्योतिषी हीं मानव के प्रकृति का अध्ययन कर उसे अपने विकास, रक्षण तथा संवर्द्धन का मार्ग बता सकता है। वह आकाशीय स्थिति तथा सामुद्रिक हस्त परीक्षण कर एक बालक को वर्तमान भीतरी तथा बाहरी प्राकृतिक प्रदूषण से बचा सकता है। वही मानवजाति और मन के प्रकृति का रक्षण और विकास कर सकता है। क्योंकि ज्योतिषी के पास आध्यात्मिक दृष्टि है। ज्योति शब्द से ज्योतिष शब्द बना है। प्रकाश में हीं किसी के बीते कल और आज को देखा जा सकता है। काल को जाना जा सकता है और भविष्य को दिशा दिखाया और निर्माण किया जा सकता है। 

शुभमस्तु 

सौरभ कुमार 


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