रस-ब्रह्म साहित्य संगीत

पुरातन राम काव्य-कथा साहित्य बनाम आधुनिक राम कथा-साहित्य में राम की स्वानुभूति 

एक तरह से देखा जाए तो ‘राम-जन्मभूमि बनाम बाबरी मस्जिद के केस में सर्वोच्च-न्यायालय द्वारा एक अभूतपूर्व महान-साहसिक तथा भारतीय दृष्टि से दिया गया एक महत्वपूर्ण फैसला भारत में आस्था का सौन्दर्य लिए है। यहाँ उदारता का भाव सबसे महत्वपूर्ण है। साथ हीं साथ राम पर नये ढंग से विचार भी प्रासंगिक हो गए है। यह अनायास नहीं है कि केस का फैसला आने के बाद पटना पुस्तक-मेला (गांधी मैदान, 2019) में राम से संबंधित पुस्तकें खत्म हो गयी।

प्रकृति विकसनशील है। जगत विकसनशील है। मानव विकसनशील है। मानवीय स्वभाव और चिंतन विकसन शील है। उसी तरह मानव की स्वानुभूति भी विकसनशील है।

राम के मर्यादा पुरोषत्तम रुप के साथ भगवत्ता स्थापित होती गई। यहाँ तक की वे भगवान हो गए। इसके साथ वे ब्रह्म के समतुल्य या ब्रह्म के रुप में स्थापित होते गए। इन सब में राम की अपनी अनुभूति अर्थात् राम की स्वानुभूति भी बदलती गई है। आदि कवि वाल्मीकि के राम की स्वानुभूति अलग है। भवभूति के राम की करुण स्वानुभूति अलग है। महाकवि भास की ‘प्रतिमा-नाटकम्’ में राम की स्वानुभूति अलग है। ‘रामचरितमानस’ में राम की स्वानुभूति अलग है। जहाँ तुलसी के राम   सीता को सीता-हरण के पश्चात वन-वन भावुक होकर खोजते हैं वहीं कालिदास के रघुवंशम् में राम लंका से अयोध्या लौटते हुए विमान से सीता को राम द्वारा खोजी गई जगह को भावुक होकर दिखाते हैं। उसी तरह कंब रामायण, अद्भुत रामायण, अध्यात्म रामायण, कृतिवास रामायण में राम की स्वानुभूति अलग है। राम  का वर्णन ‘पउम चरिउ’ और ‘महापुराण’ में भी है। बौद्ध परंपरा में राम को ‘बुद्ध’ और जैन परंपरा में ‘जिन’ के रुप में देखा गया है। पुराणों की अपनी दृष्टि है।  इसी संदर्भ में कबीर, नानक के राम के स्वरूप और स्वभाव में अंतर है। अंगी रस के प्रसंग में यह माना जाता है कि अंतत: कवि की भावना का साधारणीकरण होता है। फिर भी कवि की अनुभूति अलग है तथा उस पात्र की अपनी स्वानुभूति में अंतर है। सहानुभूति और स्वानुभूति में अंतर होता है। यह जुड़ा हुआ है लेकिन एक शोधार्थी की दृष्टि से सूक्ष्म अंतर तो जरूर होता है। पहले के मुकाबले आधुनिक राम कथा-साहित्य में यह स्वानुभूति अधिक निखरी है। जैसे द्विवेदी युग की इतिवृत्तात्मकता और छायावाद की स्वानुभूति में तीव्र स्पष्ट तथा वैयक्तिक फर्क है। उसी तरह ‘वैदेही वनवास’, ‘साकेत’, ‘पंचवटी’, के  मुकाबले ‘राम की शक्तिपूजा’ में और ‘अभ्युदय’ (नरेन्द्र कोहली) के मुकाबले आधुनिक या ज्यादा अभी के समय के मैनेजमेंट गुरु लेखक अमीष त्रिपाठी के राम कथा साहित्य में यह अत्यंत ही प्रखर तथा चमकीले रूप में परंपरा का रस लिए वैयक्तिक स्वानुभूति को प्रखरता से लिए हुए है। इसी कड़ी में डॉ. विनय के उपन्यास को भी देखा जा सकता है। प्रसंगत: दलित कथा साहित्य में राम अलग रुप में आते हैं। यह एक प्रकार का एंटीथीसिस है।  

मेरी समझ से जिस तरह भारत में राम चिरंतन हैं। उसी तरह कवि-कथाकार की भाव दृष्टि से राम की स्वानुभूति की अपनी विशेषता और चिरंतनशीलता है। यहाँ पर कबीर के राम की भी अपनी विशेषता है। नानक के राम की भी अपनी विशेषता है। दार्शनिकों की दृष्टि का भी अपना महत्व है। कवि-कथाकार को ये चालित तो जरूर करते हैं। कहा जाए तो ये एक तरह से कोच की तरह हैं। परंतु भारत की वाचिक परंपरा में भी विश्वास करने वाली जनता कवि-कथाकार के साथ-साथ कथावाचको से भी ज्यादा प्रभावित होती है। इसमें स्वामी रामसुखदास, मोरारीबापू, हनुमान प्रसाद पोद्दार आदि अग्रणी नाम है। जिनके परिप्रेक्ष्य में राम-सीता आदि की स्वानुभूति का अध्ययन किया जा सकता है। 

लेकिन मुझे एक तथ्य यह भी लगता है चाहे राम किसी के भी हो वे अपने साथ एक खास रस को साथ लिए हीं चलते हैं। राम की स्वानुभूति के संबंध में यह भी एक महत्वपूर्ण साक्ष्य भी है और दृष्टि भी तथा अध्ययन में सहायक भी है। जिस तरह हम अंत: तथा बाह्य साक्ष्य की तलाश करते हैं उसी तरह यह रस भी एक साक्ष्य की तरह प्रकाश देते हैं। जिनमें हम देख सकते हैं। यहाँ तक आज जिस तरह सिनेमा, धारावाहिक, ड्रामा या साहित्य में रसेतर दृष्टि या अभिव्यंजना मिलती है। अब के समय के लेखक अमीष त्रिपाठी के कथा साहित्य में उनके बिजनेस गुरु के दृष्टि होते हुए भी, कथा के रोमांच शैली होते हुए भी, रस का उल्लंघन नहीं हुआ है। या ये कहा जा सकता है कि वही राम-कथा भारत में सफल है जो रस की स्वानुभूति से संश्लिष्ट है।

सौरभ कुमार


सृष्टि रसमय है। ब्रह्मांड रसमय है। अथातो ब्रह्म-जिज्ञासा का समाधान रस है। रस तो रस हैं। उनकी मात्रा और संयोग से वे हमारे अपने और हमारी मानवता और सारी सृष्टि में हीं अच्छे-बुरे बनते हैं। साहिय या संगीत उसी रस से परम ब्रह्म या परमानंद को पाने की अनुभूति है। इनका सृजन या आस्वादन या अध्ययन भी इस रूप में आवश्यक है।

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