रस-ब्रह्म साहित्य संगीत
उन अश्कों के लिए जो कभी उन आंखों में छलके
प्रियवदंबा
(गांगेय: अम्बा से प्रियवदंबा तक)
1.
गंगा देख,
तेरे गांगेय ने जमीन पर अपना पहला कदम बढ़ाया है।
अच्छा है, वो अब जमीन की तपीश का भी सामना करे।
आओ, आ, आs, आ, आओ ना, आता क्यूँ नहीं, आ, आओs, आओss, आओ ना, आते जाओ आओssss.......
(ये तो तुम्हारी शुरूआत है जिन्दगी के तपते रेत पर चलते रहने के लिए, बढ़ते रहने के लिए, जिसकी शुरूआत तुम करोगे परंतु न अंत दूसरा कर पायेगा न तुम कर पाओगे)
आ, आs, आओ नाss,
2.
आचार्य,
एक युद्ध का आचार्य अपने हाथ से सौंदर्य का निर्माण करते हुए आज क्यों गुनगुना रहा है।
आओ गांगेय
एक योद्धा के लिए यह समझ जाना भी अच्छा हीं है। एक योद्धा के लिए सौंदर्य इतना अहम क्यूँ होता है।
एक युवराज के लिए यह तो और भी अहम है कि वह यह जरूर समझे और अनिवार्य युद्ध और प्रेम के बीच क्या है।
और यह महत्वपूर्ण क्यूँ है आचार्य।
एक सैनिक के लिए युद्ध लड़ने न लड़ने का विकल्प नहीं है। उसे सिर्फ और सिर्फ लड़ना होता है। वह केवल अपनी आसक्ति जानता है।
और युवराज के विकल्प क्या है?
युवराज के लिए नहीं है। उनके लिए है जिन्हें व्यवस्था कायम करनी है। शासन को चलानी है। व्यवस्था सिर्फ अपने नियमों के हीं अनुकूल नहीं होती, प्रस्तुत परिस्थिति के भी अनुरूप होती है। एक महत्वपूर्ण बात और है गांगेय।
वो भी क्या है आचार्य।
युवराज सिर्फ भावी शासक हीं नहीं, राजा के अयोग्य निर्णयों को रोकने के लिए चुनौती देने वाला वर्तमान शासक भी है।
तो क्या यह राजा का प्रतिद्वंद्वि होना नहीं है?
यह प्रतिद्वंद्वि होने के लिए नहीं है। युवराज का काम शासन में सहयोग देना है। वह राजा का सहयोगी नहीं। शासन चलाने वाले राजा का सहयोगी है।
क्या एक युवराज द्वंद्व दे सकता है?
दे सकता है, अवश्य दे सकता है, अगर वह अपनी स्वतंत्रता से रूद्ध नहीं होता। अगर वह शासन से बंधा है तो दे सकता है। राजा से बंधने वाले नहीं दे पाते।
सौंदर्य वाली बात आचार्य।
सृष्टि में रस को देखना, जीवन देखना सौंदर्य है।
और प्रेम क्या है आचार्य?
सौंदर्य के जीवन और रस के पीछे ईश्वर को देखना हीं प्रेम है। इन सब के पीछे के मूल्य के उचित महत्व को समझना शासन की नीति के लिए हीं महत्वपूर्ण है।
कई बार इनके संरक्षण के लिए युद्ध का न करना हीं श्रेयष्कर है। कई बार इनके हीं संरक्षण और वृद्धि के लिए युद्ध करना होता है। हिंसा द्वारा भी उतनी हीं सौंदर्य है जितना न करने से उनका क्षरण है।
महत्वपूर्ण इन सबके पर्दे में रहने वाला ईश्वर है।
अब जाओ गांगेय तुम्हारे संगीत का समय हो गया।
3.
आइए युवराज,
आज आप पिता से मिले और आप की माता जा रहीं है।
सत्य तो ये भी है कि वो एक पुरूष भी हैं और वो एक स्त्री भी हैं। जिनकी अपनी स्वतंत्र जिंदगी है।
क्या आपकी पिता से बात भी हुई।
हाँ, मैंने उनका और राज्य के सुचारू रूप से चलाने में मदद का आश्वासन दिया है। मैंने उन्हें हस्तिनापुर अपनाने का आश्वासन दिया है।
सीमा क्या है, इस राज्य की आप देख लें।
सीमा पर एक शांत, स्थिर, जड़ गौरवशालिनी सौंदर्य के प्रवाह को आते गांगेय ने देखा-
संगमरमर हो या संगे मरमर*
पत्थर हो या पत्थर की मूरत
*१. सफेद पत्थर ,२. उजाले का साथ
उस प्रवाह ने एक निमेष को देखा और आगे बढ़ गई-
ऐसी भी चाहत नहीं कि तुम्हे चाहूँ
हसरत है एक भरी निगाह तुम्हे देखूँ
4.
सावन के जल बूंदों में हस्तिनापुर भींग कर अपनी ऊर्जा रहा था, गांगेय अपने झूलते कुर्सी पर बैठा अपने ओब्सेसिव रूप को देख रहा था। उस क्षण को सोच रहा था जब वह अपने प्यार से मिला और मिलते हीं में खोने को भी अहसास कर बैठा।
जाने वो कौन घड़ी थी
जब तुम मिले और
हम बिछड़े थे
लेकिन इस निरंतर अहसास को जीते हुए अपने पिता महराज की वह मन:स्थिति गांगेय से छुप न सकी जो वह सावन की नदी तट की हरियाली से ले कर आते जा रहे थे। अपने लचीले और घूमने वाले राजदरबार के आसन को लेने की प्रतीकात्मक औचित्य और आवश्यकता का पूरा करने का समय गांगेय को दिखता जा रहा था।
अपने निजी सचिव के द्वारा गांगेय यह जान चुका था कि वह जिस अग्नि की तपिश को वह मानसिक क्षेत्र में बखूबी झेल रहा है वह बड़वाग्नि (सागर की आग) बन कर हस्तिनापुर के सम्राट को पूरी तरह घायल कर चूका है।
अब अगर वह इस स्थिति में एक युवराज का हस्तक्षेप नहीं करेगा तो संमृद्ध होते आर्य संस्कृति की पताका की स्थिति को हस्तिनापुर खो देगा।
युवराज के रूप में पहली हीं चुनौती सम्राट के अवरूद्ध मानसिक स्थिति से उत्पन्न राजव्यवस्था के अवरोध और राजकीय संधि के दायित्वों में शिथिलता से हस्तिनापुर को निकालने का था। एक मार्ग खुद के अधिकारों को बढ़ा कर दायित्वों को पूरा करने का हो सकता था। यह अस्थयी सफलता दे सकता था परंतु महाराज शांतनु के निकटवर्ती संबधियों में (जो महारज शांतनु और गांगेय के बाद हस्तिनापुर के राजगद्दी के अधिकारी थे) उसकी राजनीति के प्रति अविश्वास और दुर्भावना को जन्म देकर एक सत्ता का शीतसंघर्ष दे सकता था जो राजदरबार में आए नए युवराज के लिए एक अभीप्सित स्थिति नहीं था।
5.
हमेशा की महत्वपूर्ण स्थितियों की तरह गांगेय अपने रथ को खुद चलाने का प्रशिक्षण लिए अपने नियति की तरफ बढ़ रहा था। प्यार सिर्फ प्यार करने वाले को हीं मजबूर नहीं बनाता, हद से बढ़ जाए तो दूसरे को भी मजबूर बना देता है।
वह उस व्यक्ति से मिलने जा रहा था, जो पर्वत से निकलने वाली नदी की तरह जिसकी महत्वाकांक्षा भी पर्वत को भेद कर अपनी जड़ जमा चुकी पेड़ बन चुकी थी।
एक संन्यासी के भविष्यकथन के लिए राजनीति के कठोर भूमि को इंकार करने की ठान चुका था।
गांगेय की कूटनीति की यह पहली हस्तिनापुर परीक्षा लेने जा रहा था।
6.
एक ऐसा पिता जो शिकार हुई मछलियों को बेच कर अपने समाज में प्रमुख हो रहा था। जो अपनी स्थिति को ऊपर उठाने की जिजीविषा को लिए उत्कंठित बैठा था। वह पिता एक महर्षि की भविष्यवाणी को लिए, एक यशस्वी राजा के श्वसुर बनने की दृढ़ आशा के साथ बैठा था। जहाँ एक भक्त अपने एकनिष्ठ भक्ति द्वारा भगवत्ता को पाता है। जहाँ एक योगी और साधक ध्यान द्वारा अपने को ब्रह्म से मिला पाता है वहाँ वह धीर धीवर पिता गांगेय द्वारा नियति और अपने सब्र को मूर्त्तिमान रूप पा रहा था तो उसे दोष नहीं देना हीं सही था। वह अपने उच्चता को हीं नहीं वह अपने नन्हीं बच्ची की नियति का संरक्षण भी कर रहा था। जो अब नन्हीं बच्ची नहीं थी। वह विचार कर सकती थी। जो राजा के सानिध्य के गौरव को समझ रही थी। जो सत्ता के राजनीति के उलझनों को भले न समझ पायी हो उन में संलग्न व्यक्ति के उलझनों को देख पाती थी।
उस व्यक्तित्व को देख कर गांगेय को ज्यादा निराशा नहीं हुई। यह स्त्री नागरीय गरिमा से भले युक्त नहीं थी। अपने शांत दृष्टि में भी स्वाभिमान के गौरव से युक्त थी। जो गांगेय को सम्मान तो दे रही थी पंरतु अभिभूत नहीं थी।
हस्तिनापुर ने गांगेय की निष्ठा की दृढ़ माँग रखी और गांगेय को सत्यवती को महारानी बनाने के लिए इन मांगों के औचित्य में विरोध नहीं दिखाई दिया। एक प्रेमी महाराज के लिए दृढ़ भावुक युवराज ने महारानी सत्यवती के पिता की मांग को स्वीकार कर लिया। उसे व्यक्तिगत वचन में असुविधा नहीं हुई। पंरतु राजगद्दी में महाराज की छवि ने अपने गुरू की प्रतिध्वनि (दे सकता है, अवश्य दे सकता है, अगर वह अपनी स्वतंत्रता से रूद्ध नहीं होता। अगर वह शासन से बंधा है तो दे सकता है। राजा से बंधने वाले नहीं दे पाते।) को सुन गांगेय सिहर उठा।
जब अतिरथी गांगेय ने सारथी बन कर महारानी सत्यवती को रथ पर ले कर हस्तिनापुर महल के लिए चला तो न गांगेय ने जाना नियति उसे किन स्थितियों का संरक्षक बनाने जा रहीं है और न मछलियों के शिकार के लिए नौका चलाने में कुशल सत्यवती ने जाना उसे नियति ने किन बातों के लिए शिकार बना लिया है।
7.
कभी-कभी नियति नाटकीय अंदाज में हमें थोड़े से सुख दे देती है ताकि हम आने वाले अन्जान दुखों के भोले शिकार बन सकें। जहाँ हम उस रास्ते पर इतनी दूर चले जायें जहाँ रास्ता हीं सिद्धी का रूप हो जाए। स्वस्थ राजकुमार चित्रांगद और नन्हीं कली विचित्रवीर्य के आने से महाराज पिता शांतनु का जीवन भरा-पूरा हो चुका था। राज्य की सीमायें भी बढ़ चुकी थी। समाज सांस्कृतिक रूप से ज्यादा समृद्ध हो चुका था। महारानी सत्यवती के जीवन में संतोष का भाव आ चुका था। युवराज गांगेय या संरक्षक गांगेय का प्रभाव आर्यावर्त पर फैल चुका था।
गांगेय के सामने अब अल्पवयस्क भावी महाराज चित्रांगद के प्रशिक्षण का दायित्व आ चुका था। शांतनु अब दिवंगत हो चुके थे। अब गांगेय के सामने पहली बार वास्तव सामने आ खड़ा हो चुका था। कहने को दायित्व और महत्व बढ़ चुका था। परंतु औचित्य अब गांगेय के सामने हीं नहीं दूसरों के निगाहों में उत्तर ढूंढता था। महारानी सत्यवती अब गांगेय पर ज्यादा भरोसा करने लगी थीं और दरबार के लोग जानबूझ कर महारानी के प्रति सम्मान और नेतृत्वकुशलता की तारीफ करते थे। चित्रांगद अब उनकी निगाह में गांगेय के समृद्ध अभिभावकत्व में दूसरा समर्थ चित्रांगद बन रहा था। जो हस्तिनापुर के लिए अकेले हीं काफी था। गांगेय जानते थे कि अब युद्ध बढ़े स्तर पर होगें अत: अकेला महारथी महत्वपूर्ण होते हुए भी सब कुछ नहीं हो सकता। अत: उन्होंने हस्तिनापुर की सेना में जंगली, आदिवासियों और दुर्दमनीय लोगों की पहली पंक्ति बनाना शुरू कर दिया था।
8.
चित्रांगद गांगेय का छोटा भाई था। अभाव का कोई भाव हो या न हो, अभाव की कोई सत्ता हो या न हो, भले कोई भाव आप में अंगड़ाई ले या न ले, भाव अपने भीतर रूप बदल कर उसकी पूर्ति कर लेता है। मन स्वयं में सबसे बड़ा रंगकर्मी होता है वह क्षतिपूर्ति कर लेता है। खुद गांगेय ये नहीं जान पाया कि चित्रांगद कब उसके छोटे भाई के बदले उसके वात्सल्य का अवलंबन बन चुका है। गांगेय का अनुशासन उस माली का अनुशासन बन चुका था जहाँ एक पौधा सिर्फ पौधा हीं नहीं होता। वह स्वयं माली का मूर्त्तिमान रूप हो जाता है। गांगेय अपनी वात्सल्य भाव का सार्थकता और निर्थकता दोनों हीं समझता था। चित्रांगद जो उसके लिए था वह खुद चित्रांगद के लिए नहीं था।
गांगेय अब अपनी भूमिका को आध्यात्मिक तप के लिए तैयार कर रहा था। महामुनि व्यास से उसकी नजदीकि उसे उस ओर ले जा रही थी। अब वह वेद की त्रयी के मुकाबले अथर्ववेद को त्रयी वेद के साथ मुख्य भूमिका में लाना चाह रहा था। ब्रह्म को जानने के लिए समन्वयात्मक कथ्य के रूप में उपनिषद की योजना को सफल बनाने में गांगेय की कार्ययोजना की रूचि थी।
अनुशासन अपने भीतर संरक्षण का रूप लिए होता है। अनुशासन सिर्फ बंधन हीं का रूप नहीं है। यह रक्षा का भी रूप है। यह बंधन हीं हमें अनचाहे से अन उल्लेखनीय रूप से रक्षा कर रहा होता है। यह इतने सूक्ष्म रूप से करता है कि हम नहीं जान पाते। इन्हें वे जान पाते हैं जो चाहकर भी घात नहीं लगा पाते हैं।
चित्रांगद के साथ भी यही हुआ जो सबके साथ होता है। प्रशंसा खतरनाक चीज होती है। वे लोग भाग्यशाली होते हैं जो नहीं जान पाते कि यह कितने खतरनाक घाव दे सकती है। चित्रांगद के साथ भी यही हुआ। हाल के युद्ध में मिली जय में चित्रांगद को श्रेय तो पूरा मिला परंतु विपक्षी के मर्म पर पूरा वार करने का मौका नहीं मिला। उस अप्रत्याशित प्रत्याक्रमण का मिलने वाला गुप्त व्यूह हमला गांगेय हीं झेलते थे। अपने महत्वपूर्ण व्यूह पर सफल भूमिका ने, चित्रांगद को सर्वप्रमुख व्यूह पर रहने की युद्धोत्साह चित्रांगद में पूरे तरह से जाग चुका था। गांगेय अपने संरक्षण में चित्रांगद को पूरी तरह परिपक्व करना चाहते थे ताकि वह शत्रु की प्रत्याक्रमण को पूरी तरह समझ ले। लेकिन वह संरक्षण अब उसके लिए बंधन बन चुका था।
युद्ध में मृत्यु भले एक वीर की योग्य मौत हो। हम अपने शहीद के लिए कितना हीं गर्व से सीना चौड़ा कर ले। युद्ध में मिली मृत्यु भले हीं स्वर्ग दे। लेकिन विदा विजय के लिए हीं किया जाता है। गांगेय को भी चित्रांगद को विजय के विदा करना पड़ा। यह पहला मौका था जब हस्तिनापुर की युद्ध में वह महत्वपूर्ण प्रत्याक्रमण पर वह नहीं था। सीमा पर अनार्य लोगो से अत्यंत वीरता से लड़ते हुए महाराज चित्रांगद वीरगति को प्राप्त हो गए। चित्रांगद की मृत्यु हो गई।
9.
सत्यवती महारानी थी। महाराज शांतनु के वंशवृक्ष को आगे सुरक्षित ले जाने की जिम्मेदारी उनकी थी। परंतु उसे पूरा करने का भार गांगेय के हीं कंधो पर था। चित्रांगद की मौत ने महारानी सत्यवती को निश्चय रूप से तोड़ा। लेकिन गांगेय अब मानसिक रूप से पौढ़ होते जा रहे थे। जहाँ अब वे इस यौद्धा जीवन से अलग होना जाना चाहते थे। अब वहाँ यह खुद जीवन से युद्ध बनता जा रहा था। चित्रांगद के नि:संतान मृत्यु ने कोमल विचित्रवीर्य के भविष्य के प्रति महारानी और संरक्षक गांगेय को अति सतर्कता से भर दिया था। जहाँ जीवन खुशी का उपवन होना चाहिए वहाँ यह प्रतिज्ञा के देवत्व से कर्त्तव्यों के निर्वहण की युद्धभूमि बन चुका था। यहाँ पूरे दायित्वों की गिनती नहीं होनी थी, असफल कर्त्तव्यों का उत्तर दूसरों के बिन पूछे निगाहों में देना था।
10.
जहाँ एक स्त्री के लिए दुल्हन बनना हीं मानो सार्थकता हो वहाँ क्या दूल्हा बनना हीं क्या एक पुरूष की सार्थकता है, यह प्रश्न गांगेय के संदर्भ में सत्यवती के मानस में उठने लगा था। जिस महारानी के गरिमा और राजमाता के सुख के लिए गांगेय के जीवन का रस वंचित हुआ था क्या वह वाकई में महत्वपूर्ण था। क्या एक साधारण गृहिणी की तरह अपने क्षुद्र जीवन में भोजन बनाते हुए वह जीवन ज्यादा महिमाशाली नहीं होता, जो एक राजमाता होते हुए दूसरे के सुख को वंचित करते हुए पाया है, जो पुत्र उसका भी है। द्वंद्व के झूले में झूलते हुए वे विचित्रवीर्य के शीघ्र विवाह के लिए उत्कंठित होते जा रहीं थी।
11.
काशीराज इन्द्रद्युम्न एक शैव परंपरा का अनुयायी था। वह राजकुमारी पार्वती के दृढ़निश्चय और सही निर्णय लेने की क्षमता से अभिभूत था। पार्वती जिस प्रकार अपने लिए अद्वितीय न कहकर अपना स्वयं का दूसरा रूप खोज लिया था, यह कहना ज्यादा उपयुक्त होगा, इसने काशीराज के शैव बनने में महत्वपूर्ण योगदान दिया था। काशीराज स्वतंत्रता के अधिकार को समझता था। उसके लिए इसके बिना आध्यात्मिक मार्ग पर चलने का अखंड निश्चय भी असंभव था। उसने काशी को सिर्फ और सिर्फ आध्यात्मिक क्षेत्र हीं नहीं रहने दिया। उसके लिए यह विश्वास करना कठिन था कि जो शिव तीसरे नेत्र से कामदेव को जला सकते हैं वे बिना पार्वती के अनुराग के ही पार्वती को अपने सती के प्यार के श्मसान बने हृदय में जगह दे दी होगी। गुरूजनों और अभिभावक के रास्ता पर चलना हीं अगर श्रेय का एकमात्र सही रास्ता हीं होता तो खुद सदाशिव को अपने लिए वैवाहिक रीति से संपन्न पाप से तारने वाली पत्नी मिल जाती लेकिन वे खुद कभी प्यार की अनुभूति कर पाते क्या? काशी का राज्य अध्यात्म, शिक्षा, और सैन्य शिक्षण का जगह नहीं रह गया। काशी में जो कला पनपी वह मानव के रूक्ष स्वभाव के भीतर गहरी तरलता को व्यक्त करने लगी। इसका प्रभाव यह पड़ा कि काशी साम्राज्य के होड़ में पीछे पड़ गया। उस काल में जब राजकुमारी का हरण आश्चर्य पैदा नही करता था। और उस अपहृता राजकुमारी भी इसे दूसरे द्वारा निर्धारित नियति मान अपने जीवन को होम कर देती थी। काशी ने अपने कला संपन्न राजकुमारियों का स्वयंवर का अधिकार देने का निश्चय कर लिया।
अम्बा को गौरवर्ण का कहना निश्चय हीं न्याय करना नहीं कहा जाएगा। वह अपने भीतर सौंदर्य की चारूता ली हुई थी। वह सामान्य राजकुमारियों से किंचित ऊंची थी। उसका चेहरा गोल नहीं था। अपने चेहरे की लंबाई के मुकाबले चौड़ाई ज्यादा थी। जो अपने चिबुक के पास नुकीली थी। उस पर उसके साधारण से थोड़ी लंबी नाक अपने थरथराते पतले मूंगे से अधर उसे उसके भीतर के तेज और सौंदर्य से भर देते थे।
वह सरस्वती के भीतर लक्ष्मी के तेज को सम्हाले बैठे थी। जो अपने संगीत और पिंड और ब्रह्मांड की ऊर्जा को नृत्य के भीतर समेटे हुए थी।
वह मार्तिकावत के राजा शाल्व की सहपाठिन रह चुकी थी। वह राजकुमार था। उसकी भी रूचि संगीत में थी और उससे भी ज्यादा अम्बा के भीतर के जीवित संगीत में था। वह ना तो अम्बा की कोमलता का मुकाबला कर पाया और न हीं क्षिप्र लय का संधान कर पाया। एक तरफ के संधान ने उसे उस क्षिप्र लय से वंचित कर दिया जो एकाग्र रूप से अपनी प्रतिभा को लागाए रख कर प्राप्त होता है। इसका घाटा उसे एक योद्धा के रूप में मार्तिकावत में आकर उठाना पड़ा था।
अम्बा शाल्व के अनुराग को समझती थी। परंतु उसने अपने शिक्षण काल में प्रणय करने में रस नहीं लिया। वह उसे अपने सहयोगी के रूप में जरूर ज्यादा उपयुक्त मानती थी। शायद वह यह भी समझती थी उसके जैसे कलाकार और राजकुमारी का मिलना शाल्व का सौभाग्य मानना चाहिए। वह सही समय पर उपयुक्त निर्णय ले लेगी इसका वह विश्वास रखती थी।
काशीराज इन्द्रद्युम्न अम्बा के भीतर के इस मनोभाव को नहीं जानता था। उसने स्वयंवर की घोषणा कर दी। अम्बा स्वयं वर तो चुनना चाहती थी परंतु वह बिना स्वयंवर के ही शाल्व को चुनना चाहती थी। लेकिन अब इस परिस्थिति में स्वयंवर अनिवार्य था।
अम्बा इस तरह उस रास्ते पर आगे बढ़ गई जहाँ उसे एक जन्म में अग्निस्नान कर स्वयं को भस्म कर देना पड़ा। दूसरे जन्म में जलसमाधि लेकर स्वयं को जल में तिरोहित कर दिया। तीसरे जन्म में अश्वत्थामा ने शिखण्डी के तन को अपने फरसे से दो टुकड़े कर दिया !
अम्बा उस रास्ते पर स्त्री के दुल्हन बनने के तथाकथित सबसे बड़े स्वप्न को लिए आगे बढ़ गई।
12.
हस्तिनापुर पर बढ़ते वेदव्यास और गांगेय की चौथे वेद और उस गुरू परंपरा पर बढ़ते रूचि ने परंपरावादी राजाओं के मन में हस्तिनापुर से दूरी बढ़ाने में योगदान दिया। विचित्रवीर्य के कोमल स्वास्थ्य ने उसे युद्ध से दूरी बनाने पर मजबूर किया था। महारानी सत्यवती गांगेय के भीतर के उदासी से अपरिचित नहीं थी। वे अब कोई अनहोनी नहीं चाहती थीं। वे अब शांतिपूर्वक राज्य को स्थिर कर आगे बढ़ाना चाहती थी। युद्ध में गांगेय अग्रणी भूमिका निभाने को अब भी सोत्साह हीं थे। पर इन सब में विचित्रवीर्य की अनुपस्थिति मामले को अनावश्यक रूप से नाजुक बना सकता था। सीमा पर जंगली और नरभक्षी लोगों का दबाब बढ़ने लगा था। मगध और मथुरा की बढ़ती प्रबलता ने उन्हें हस्तिनापुर की तरह ढ़केल दिया था। ऐसे हालात में यथास्थिति को रख कर अपने को सुदृढ़ करना हीं सही होता।
विचित्रवीर्य के प्रति अन्य राजाओं की अनदेखी ने गांगेय को चिंतित किया था। उन्होंने अब उस स्त्री तेज को खोजना शुरू किया जिसके साथ तेज और शांति अपने सर्वोत्तम रूप में संतुलन बना सके।
अम्बा में उन्हे वह रूप दिखाई पड़ा जो सबसे शक्तिशाली साम्राज्य को भी शक्ति दे सकती थी और हस्तिनापुर उसे साम्राज्ञी के रूप में स्वीकार कर लेता। स्वयंवर के रूप में यह उसे एक उपयुक्त अवसर लगा।
13.
अपने शिक्षण काल का प्रेमी हार गया। यह जीवन सिर्फ दो प्रेमियों का प्रेमक्षेत्र हीं नहीं है यह सच में युद्धक्षेत्र भी है। गांगेय ने सारे राजाओं को अपने चलते रथ पर हीं से तीर चला कर अकेले हीं हरा दिया। अगर शाल्व लय के अठगुण में गाते अम्बा पर आकर्षित हुआ था तो अपने असफल ऑब्सेसिव प्रेम की आग को लिए दौड़ते रथ पर अठगुण की लय से अचूक तीर लक्ष्य पर गांगेय चला सकता था। संगीत का प्रशिक्षण लिए कोई यौद्धा ऐसा युद्ध प्रदर्शन कर सकता है यह किसी ने सोचा भी नहीं था। लय में बंधे हाथ सिर्फ तीर हीं नहीं लक्ष्य को भी लिए हुए हैं यह युद्ध में पहला हीं प्रदर्शन था।
जिस हस्तिनापुर महारानी बनने का आग्रह ठुकरा कर अम्बा आगे बढ़ गई थी, वही अम्बा आज अम्बिका, अम्बालिका के साथ युद्ध के बाकी पराजित योद्धा राजओं को छोड़ हस्तिनापुर की तरह जा रही थी। शाल्व ने पीछा कर सेना के साथ युद्ध किया। परंतु पराजित वही नही हुआ। पराजित अम्बा भी हुई। कोई संगीत की अनुभूति युद्ध में दे सकता है यह उसके लिए प्रभावकारक था। परंतु प्रभावकारक हीं। प्यार वह अब भी वह शाल्व से हीं करती थी। प्रभाव का मतलब प्यार नही होता। अब वह उस महारानी से मिलने जा रही थी जिसने खुद हीं प्रेमविवाह किया था। वह उस महारानी से हीं न्याय चाहती थी।
14.
ईश्वर सत्य है। परंतु ईश्वर के संपूर्ण सत्य को मानव कहाँ सहेज पाता है। वह अपने आयत्त सत्य को हीं ईश्वर के रूप में स्वीकार कर पाता है। तब उसके लिए उसका सत्य या कहें कि सत्य हीं ईश्वर होता है। अपने सत्य के ईश्वर को लिए अम्बा महारानी सत्यवती के सामने खड़ी हो गई। समझाया उन्हें जा सकता है जो क्षणों जीते हैं। जो सत्य का रूप लेकर जीते हैं उन्हें हिलाया नहीं जा सकता। शुरू में अम्बा के सत्यकथन ने अम्बा को प्रसन्न किया। अम्बा के विचित्रवीर्य के महारानी न बनने के निश्चय ने सत्यवती को नियति के प्रति गुप्त आशंका से भर दिया। अम्बा को अभी यह लौकिक ज्ञान नही था कि सत्य का आग्रह किन रास्तों से जिंदगी को ले जाती है। और शायद अहसास के बाद भी वह किंचित रास्ता बदलती। अम्बा भारत के सबसे बड़े साम्राज्य को ठुकराकर सत्य के रास्ते पर चल पड़ी।
गांगेय को सत्य जानने के बाद अम्बा को हस्तिनापुर की राजकुमारी की तरह मार्तिकावत के राजा शाल्व के पास भेजने का निर्णय हीं उचित लगा। काशीराज जितने उपहार दे सकते थे उसके दसगुणा उपहार देने का प्रस्ताव उन्होंने महारानी सत्यवती को दिया। अम्बिका तथा अम्बालिका के द्वारा विचित्रवीर्य से विवाह की स्वीकृति ने हस्तिनापुर को थोड़ी राहत जरूर दिया।
15.
गांगेय के मार्तिकावत के राजा शाल्व के प्रति अपराधबोध को लिए तरल अनुरोध के साथ, हस्तिनापुर की राजकुमारी की गरिमा लिए अम्बा अपने प्रेम की तरफ चल पड़ी। स्वाभिमान अच्छी चीज है। परंतु इससे बड़ी बुरी वस्तु भी कोई और गुण नहीं है। हमारे और हमारे प्रेम के बीच इससे बड़ी अवरोध भी कोई नहीं है। शाल्व अपना पराजय भूला नहीं था। स्वाभिमान का दर्प पराजय के साथ मिलकर देखने की दृष्टि को और भी धूमिल कर देता है। हम लाख कहें प्रेम हीं ईश्वर है। पर ईश्वर भी कहाँ काम आ पाता है जब तक विश्वास न हो। विश्वास हीं ईश्वर को हमारे लिए ईश्वर बनाता है। बिना प्रिय पर विश्वास के प्रेम का ईश्वर कूच कर जाता है। शाल्व के राजापन के अविश्वास ने राजकुमारी अम्बा को राजाधिकारियों के बिसात पर बिना आधार का एक स्वतंत्र चलने वाला लक्ष्यहीन मोहरा बना दिया।
अम्बा टूटे प्रेम या टूटे विश्वास लिए पुन: हस्तिनापुर पहुँच गई। विचित्रवीर्य के लिए अम्बा के शाल्व के प्रति प्रेम ने एक ग्रंथि पैदा कर दिया। अपने समय की सर्वश्रेष्ठ राजकुमारी एक कटी पतंग की तरह आसमान की सबसे ऊँची बुलंदी से कठोर धरती की नियति के तरफ बढ़ने लगी। शाल्व और विचित्रवीर्य के ठुकराहट ने अम्बा के लिए गांगेय के अपार गहराई में ही आधार ढूंढना शुरू कर दिया। कई बार अपने विरोधी में हीं वह संभावना नजर आती है जो रास्ता बना सकती है। ऐसा इसलिए नहीं कि वो विरोधी है या आततायी बल्कि इस लिए क्योंकि उसमें एक दृढ़ता है जो ढुलमुल पन से दूर है। इसके बिना आततायी आततायी है। उसकी स्थिति में परिष्कार असंभव है।
गांगेय ने अम्बा को अपने दुल्हन बनने से नहीं ठुकराया। उसके लिए न तो शाल्व की तरह कुंठा अपने प्रेम के प्रति हुई। न विचित्रवीर्य की तरह शाल्व के प्रति प्रेम को लेकर हुई। अपनी ठंढ़ी निगाहों से गांगेय ने अपनी प्रतिज्ञा के सत्य के लिए खुद को अम्बा के लिए इंकार कर दिया। अम्बा ठंढ़ी निगाहों के विषण्ण संदेश को बर्दाश्त नहीं कर पायी।
16.
एक फलहीन जिदंगी को लिए अम्बा नाना होत्रवाहन के पास हिमालय चल आई। अब उसके लिए गांगेय को अपने लिए झुकाना या अपने लिए गांगेय की मृत्यु ही उसकी स्त्रीत्व की या उसके अस्तित्व की सार्थकता बन गई। गांगेय की निगाह की विषण्णता ने अम्बा को कुछ और भी सोच सकने से वंचित कर दिया। अम्बा अगर अपने गुण और सौंदर्य के कारण सर्वश्रेष्ठ थी तो अपने सबल दृढ़ता के कारण भी सर्वश्रेष्ठ थी। जल्द हीं वह हिमालय की शांत और ठंढ़ी वातावरण से ऊब गई। उसके भीतर की ज्वाला ने उसे उद्विग्न कर दिया। वह अपने नाना के कुलगुरू महाअथर्वण जाबालि के आश्रम में चली आई। अब उसके भीतर एक हीं आवाज रह गई थी। या तो उसके जीवन को बर्बाद करने वाला गांगेय खुद उस से विवाह करे या गांगेय उसके जीवन को बर्बाद करने के फलस्वरूप मृत्यु को प्राप्त हो। महाअथर्वण जाबालि चौथे वेद अथर्ववेद को महत्व देने वाले परंपरा के थे। वे महर्षि भृगु के शिष्य परंपरा में थे। स्वंय भगवान कहलाने वाले परशुराम भृगुवंशी थे। खुद गांगेय भी भगवानपरशुराम के शिष्य थे। अम्बा ने जाबालि के गांगेय पर मारण अभिचार को अस्वीकार कर दिया। उसने भगवानपरशुराम के आने और उनसे हीं न्याय करने का निश्चय लिया।
17.
परशुराम अपने नाम के अनुरूप ही निर्णय करने वाले थे। उन्हे इस निष्कर्ष पर पहुँचने में देरी नहीं लगा कि अम्बा निश्चय हीं अन्याय की शिकार हुई है। वे गांगेय के वसु होने वाले स्वभाव को जानते थे। वे जानते थे एक बार संकल्प कर लेने पर वह रास्ता नहीं बदलेगा। ना हीं वह व्यक्तिगत रूप से जीवन के प्रति उत्साही रह गया है। वे अगर गांगेय के युद्धकला के भी गुरू थे तो परंपरा से होत्रवाहन के भी गुरू थे। उन्होंने सीधा संदेश गांगेय को दिया कि या तो वह अम्बा को स्वीकार कर ले या उनसे युद्ध करे।
स्वाभिमान सिर्फ दूसरों की हीं दृष्टि को धूमिल नहीं करता। यह अक्सर हमें बाँध देता है। ये बंधन हमें मुक्त नहीं होने देता। जो बंधन कर्त्तव्य से लगाए वह तो ठीक है पर जो आत्मा को हीं बाँध ले उसका क्या औचित्य है। जिस बंधन को स्वीकार कर तांत्रिक सिद्धि प्राप्त कर परशुराम भगवत्ता को प्राप्त हुए उसे सत्यवती और गुरू के समझाने पर भी वे अस्वीकार कर परशुराम के परशु आगे खड़े हो गए। अम्बा गांगेय के इस सहज मृत्यु के सामने समर्पण को स्वीकार नहीं कर पाई।
महाअथर्वण जाबालि का आश्रम गुरू शिष्य के बीच युद्ध का गवाह बन गया। सत्यवती के गांगेय के जीवन के प्रति आकुलता ने राजगद्दी के प्रति समर्पण की प्रतिज्ञा से गांगेय को भर दिया। इतिहास का पहला शिष्य गांगेय बन गया जो गुरू से सीख कर गुरू पर हीं शिव का महान पाशुपतास्त्र चलाने का संधान कर बैठा। गुरू के लौट जाने की आज्ञा लिए वह अपने होने की औचित्य के प्रति शंका से भर बैठा।
भगवती काली का मारण निवाला गांगेय बनने से तो बच गया। परंतु उसके बचने ने अम्बा को परशुराम के सहमति से अग्नि में प्रवेश की अनुमति दिला दी। इधर विचित्रवीर्य इन घटनाओं में मूल कारण होने के कारण किंकर्त्तव्यविमूढ़ हो चला था। गांगेय के अपने होने के प्रति आश्वासन के बावजूद एक आशंका से वह भर उठा था। विचित्रवीर्य के राजमहल के सीढी से गिरने की खबर ने होत्रवाहन के आश्रम में हीं सभी को अज्ञात आशंका से भर दिया। लगा जैसे भगवती काली अपने भोग को लेने के लिए तैयारी कर चुकी हैं।
18.
किसी का लावण्य से भरा चेहरा भी सुर्ख हो कर किस प्रकार श्रीहीन हो जाता है यह अम्बा को देख कर समझा जा सकता है। अग्नि में प्रवेश के लिए बढ़ते हुए उसके मन में उलझन नहीं था। लेकिन जीवन के प्रति आस्था क्या इतनी आसानी से मिट सकती है। उसके आँखों ने कब से काजल लगाना छोड़ दिया था। उसके अश्क जब नि:शब्द रूप से निकल पड़े तो आँख के काजल का आखिर कालिमा अंश भी धुल गया। लेकिन जीवन के सार्थकता के प्रश्न को लेते हीं वही तेज लहरा उठा और वह अगले मनचाहे जन्म के लिए अग्नि में प्रवेश कर गई। जो स्नेह और नफरत एक जन्म में नहीं समा पाता वही अगले जन्म का शपथ बन जाता है। चाहे फिर वह एक जन्म की कहानी बने या सच में जीवन हीं उसी का बन कर रह जाए।
हस्तिनापुर में गांगेय और सत्यवती इन सबसे उबर भी ना पाए थे कि घायल विचित्रवीर्य की मृत्यु हो गई। सत्यवती महारानी रह गई और उनका वंश बेल मुरझा चुका था। सत्यवती के लिए नियति के बारे में एक हीं भाव रह-रह कर कौंध जाता था-
आह निकली भी न थी
और वो खफ़ा हो बैठे।
19.
जिस कुरू राजगद्दी पर गांगेय का सहज हक था। जिस कुरू राजगदी पर विराजमान अपने पिता महाराज की शपथ लिए वह बंधा हुआ था अब वह उसके हीं रिश्ते में बंधे भाई महर्षि व्यास के नियोग से उत्पन्न संतानों की छाया से बंध चुका था। हस्तिनापुर के एक उत्तराधिकारी पाण्डव शिखण्डी को आगे लिए खड़े थे तो दूसरी और दूसरा उत्तराधिकारी राजगद्दी की प्रवाहमान गति लिए हुए था। प्रश्न यह नहीं था कि गद्दी पर कौन है, प्रश्न यह है कि राजगद्दी तो वही है, हस्तिनापुर तो वही है। सुरक्षा करने का प्रश्न तो उससे हीं जुड़ा हुआ है। जिस सत्यवती ने अपने पराशर ऋषि से उत्पन्न पुत्र व्यास द्वारा अपने वंश को बढ़ाया वह कभी भी संपूर्ण रूप से संभल नहीं पाया। धृतराष्ट्र अगर अंधा होने की वजह से युद्ध में नेतृत्व करने में अक्षम होने की वजह से राजा होने के लिए अक्षम था। तो पाण्डु राजा होकर भी जीवन को सहज रूप से न भोगने के श्राप के कारण अक्षम सिद्ध हुआ। वह तो चला गया गांगेय भीष्म बन कर सभी के असफलता का दायित्व निभाने के लिए पितामह बन गया। वह उनका पितामह बना जो देवताओं के कुंती और माद्री के पुत्र होने के बाद भी अपने अधिकार और संरक्षण के लिए उस पर निर्भर थे यद्यपि वे योग्य और समर्थ थे। तो वह उनका भी पितामह बना जिनके लिए शरीर से अंधा हीं नहीं मानसिक रूप से भी महाराज धृतराष्ट्र अंधा बन चुका था। स्नेह और उत्तरदायित्व के बीच अब वह कुरूक्षेत्र के मैदान में खड़ा था। जिम्मेदारी से अलग होकर जितना परिस्थिति से निकलने के लिए सोचना आसान है उतना भावनाओं के लहर में खड़ा होकर नहीं होता। चाहे कोई गलत हो या दो पक्ष गलती पर हों। कई बार कौन कहाँ तक गलत था इस पर हीं गलती शुरू होती है। और जब गलती शुरू होती है तो गलती शुरू हीं हो जाती है और बीच में भावनाओं में न्याय करना या परिस्थिति संभालना उसे गलत हीं दूसरों की निगाह में बना कर छोड़ता है। इस सही गलत की उलझन में पड़ा वह हस्तिनापुर की राजगद्दी की सुरक्षा से जुड़ा वह हस्तिनापुर का प्रधान सेनापति बन कर खड़ा होता है।
पक्षधरता का प्रश्न महत्वपूर्ण है। पर जो इस प्रश्न को उठाते हैं वो क्या खुद जिस पक्ष में खड़े होते हैं क्या उस पक्ष की न्यून या उससे अधिक त्रुटियों से संलिप्त नहीं होते। आगे सब सुधर जाएगा क्या इस तृष्णा से आदमी निकल पाता है। विजयी भव: का आशीर्वाद देकर भी अगर वह उनके विपक्ष में खड़ा था तो अगर वह उनके विरूद्ध में खड़ा होने के लिए गलत था तो अपने पक्ष से अलग सोच सकने की उसकी पक्षधरता की दाद देनी चाहिए।
20.
अम्बा ने अगला जन्म पुरूष शरीर को न पाकर जल में समाधि ले लिया था। अगले जन्म में वह पांचाल राज द्रुपद के यहाँ शिव के आशीर्वाद से स्त्री के रूप में हुई। दशार्णाराज हिरण्यवर्मा की पुत्री से शिखण्डी का विवाह हुआ था। विवाह के बाद भेद खुल जाने के डर से वह वन में तपस्या करने लगी। स्थूणाकर्ण यक्ष उस काल का अवश्य ही महान वैज्ञानिक तथा शल्य चिकित्सक रहा होगा जिसने शिखण्डी को स्त्री से पुरूष शरीर प्रदान किया। पुरूष बन कर वह गांगेय भीष्म के सामने खड़ा था।
नौ दिन के युद्ध के बाद भी अगर पलड़ा दोनों तरफ डोलता रहा तो अपने पौत्र युधिष्ठिर को अपने को युद्ध से अलग करने का रहस्य भी खुद बता दिया। क्योंकि अगर अर्जुन नारायणी सेना का विनाश कर रहा था तो स्वधर्में निधनं श्रेय का मंत्र लिए खुद उनका पितामह हीं प्रधान सेनापति के कर्त्तव्य से बंधा उनका बड़ी तेजी से सफाया कर रहा था। भीष्म जानते थे शिखण्डी के रूप में खड़ा खुद अम्बा हीं है। और गांगेय की मृत्यु खुद अगर उन्हें कर्त्तव्य के बंधन से मुक्त कर देगा तो अम्बा को भी कई जन्मों में चलने वाली ताप से मुक्त कर देगा। इसलिए अगला दिन अगर हस्तिनापुर की सुरक्षा में भीष्म खड़े थे तो शिखण्डी को व्यूह में गांगेय के आगे खड़ा कर पाँचों पाण्डव का संपूर्ण तेज खड़ा था।
21.
गांगेय ने अगर उन्हें गिराने का अपना रहस्य बताया था तो अपने कर्त्तव्य का समर्पण भी नहीं किया था। अगर अर्जुन शिखण्डी को आगे खड़ा कर बाणों की घनघोर वर्षा शुरू किए हुए था तो स्त्री पर प्रहार न करने की परंपरा लिए अर्जुन की दायीं ओर की सेना में कौरवों का प्रधान सेनापति खलबली मचाए हुए था। गांगेय ने अपने सामने की व्यूह पर तो प्रहार नहीं किया। लेकिन आसमान पर तीर चला कर उन लौटते तीरों से अपने आगे बाणों की दीवार बना कर वे लगातार दूसरे तरफ जरूर प्रलय मचाते रहे। उन तीरों को भेद कर शिखण्डी जरूर रास्ता बनाने में सफल होते और अर्जुन के बाण शत्रु प्रधान सेनापति के शरीर को भेद देते। अगर अर्जुन तीर की दीवार को भेद रहे थे तो खुद सेनापति द्रोणाचार्य उन्हीं दीवारों का प्रयोग शिखण्डी को भेदने और अर्जुन के व्यूह को ध्वस्त करने में लगे हुए थे।
नौ दिन के युद्ध में जितना गांगेय ने पाण्डवों का विनाश किए था मानों उतना विनाश करने का काल संकल्प लिए हुए आज वह संहार कर रहा था। अन्याय का पक्ष में खड़ा अपने सत्य लिए अगर वह काल बना प्रलय कर रहा था तो न्याय के पक्ष में खड़ा अपने सत्य को लिए उसका हीं रूप अभिमन्यु उसके पक्ष में शिव का तीसरा नेत्र खोले हुए उसके सामने खड़ा था।
शरीर के भेदे जाने के बाद भी प्रधान सेनापति का आक्रमण तेज होता जा रहा था। शरीर सारा तीर से भेदा जा चुका था। परंतु तीर से भेदे जाने से मौत नहीं होती, रक्त के निकल जाने से भी मौत नहीं होती, आत्मा के संकल्प के छोड़ देने से होती है। हस्तिनापुर की राजगद्दी से बंधा वह अपने संकल्प से नहीं डिगा था। अभिमन्यु के तीर ने अगर उसके बाएँ बाजू को अलग किया तो अर्जुन के तीरों ने उसे जोड़ भी दिया। गांगेय ने अपना प्रहार उसी बाजू से धनुष को पकड़ कर जारी रखा। अभिमन्यु ने अपने दाएँ पैर को जमीन से टिका कर अपने बाएँ पैर को ठेहुने से मोड़ कर अपने बांयी हाथा को सीधा रख कर धनुष को लंबवत हीं कर भीष्म के पैरों पर प्रहार शुरू किया। शरीर के संतुलन तो बिगड़ा पर चलायेमान रथ पर भी गांगेय अपना संतुलन बचाए रखने में कामयाब रहा।
ठीक मध्यहान का सूर्य जब हुआ तो तीर के पीछले भाग में सिर्फ दांयी तरफ के निकले पंख वाले तीर ने सहदेव के गालों पर खरोच का स्पर्श देकर निकल गया। माद्री पुत्र सहदेव ने देखा तो श्रीकृष्ण के मयूर पंख से चमक कर सूर्य की रौशनी उस के आंख से टकरा रहा था। सामने भगवती की मधुर साधना में डूबे आचार्य मुस्कुरा रहे थे। सहदेव काल देवता की गति को समझने वाला ज्ञानी था। वह आज सिर्फ खड़ा था और सिर्फ खड़ा था। वह वृद्ध कौटुंबिक के गिराने के रंगमंच पर खड़ा होकर भी मानो नेपथ्य में खड़ा था। मानो भीष्म को गिराने वाले क्षण को समय पर पकड़ने के लिए शांत खड़ा था। आचार्य द्रोण की हल्की स्मित से भरी आँखे अब भी कह रही हों जिंदगी में सबकुछ प्रेय हीं नहीं होता कई बार हम अपने समझ से श्रेय के लिए करते हैं। कर्म का फल सिर्फ उतना हीं नहीं होता जितना हम समझते हैं। यह ज्यादा गहरी चीज है। हमें अपनी समझ से करना होता है उसका अच्छा और बुरा फल जब मिले तो उसे सहज रूप से ले लेना चाहिए। द्रोण के लिए वह अब उतना हीं निर्दोष था जब वह अपने पिता और माता को खोकर जिंदगी के प्रश्न को सुलझाने के लिए उनके पास आया था। पितामह ने प्रेम के प्रश्न के लिए उसे आचार्य द्रोण के पास भेज दिया था। ज्येष्ठ तीन भाइयों के पास तो अब भी उनकी माता थी। परंतु वह तो जिंदगी को समझना चाहता था। वह उस प्रश्न को लिए था क्या प्यार इतना महत्वपूर्ण है जिसके लिए अपनी जान दे दी जा सके। अगर उसके पिता ने जानते हुए अपनी प्राण गवाँ दिए तो भी क्या वह प्रश्न इतना उपेक्षणीय है।
जो जिदंगी को देख कर समझ रहा है उसके प्रश्न का जबाब न देना शिक्षा को अधूरा कर देना है और द्रोण ने वही जबाब दिया जो द्रोण के गुरु ने उनसे कहा था।
आचार्य अगस्त अपने शिष्यों को जो मधुमती साधना के बारे में कहा करते थे, द्रोण को वही परशुराम ने सिखाया। कृष्ण सर्वश्रेष्ठ हैं। वे सर्वोच्च हैं। ब्राह्मण उनकी पूजा अहिंसक तरीके से करते हैं। लेकिन कृष्ण स्वयं भगवती की साधना करते हैं। उनका ध्यान मानों उनका स्मरण करना हीं है। वे उस दुर्गा शक्ति की उपासना करते हैं जो प्रेममयी हैं लेकिन जिसे कठिनता से समझा जा सकता है। वो जितना आनंदमयी हैं उतनी हीं सहज रूप से किसी भी रूप को लय कर लेती है। वो अपने श्वेत रूप में तेज लिए दाहिने ओर मुख किए हुए है। उसकी आंखे बड़ी हीं नहीं है अपितु बाहर की तरफ भी निकली हुई है जिससे मानों सभी क्षैतिज दिशाओं के अलावे सहज रूप में उच्च और निम्न लोकों को भी देख रही है। उसकी आंखे नींद से बोझिल हैं मानो वो सतत जागरण में हीं अपनी योगनिद्रा को पूरी कर लेती हों। उसकी बांयी भुजा में तानपुरा का नाद प्रवाहित है जिससे सृष्टि अस्तित्व पाता है। उसके अंगुलियों का विराम हीं सृष्टि का बिंदु रूप होकर प्रलय हो जाना है। उस सौन्दर्य राशि के निरंतर नाद में खोए क्षीर सागर में वे ध्यान में रहते हैं। जब वे भगवती के स्नेह में डूबे सिर्फ मुख के स्मित का ध्यान करते हैं और वे संप्रज्ञात से असंप्रज्ञात में चले जाते हैं तो न तो उन्हें लक्ष्मी के आने का पता होता है और न हीं उन्हें शेष नाग द्वारा उन पर छ्त्र दिए जाने का ज्ञान रहता है जिसके बाद उन्हें ब्रह्मांड के अधीश्वर होने की शक्ति मिलती हैं। कृष्ण को इसीलिए शक्ति के अनुकूल होकर न प्रेम करने में द्वंद्वं है और न हीं कुछ भी भगवती को समर्पित करने में संकोच है। दूसरों को समर्पित वही कर सकता है जो खुद को भी भगवती को समर्पित कर दिया हो। जो जानता है सिर्फ शुद्ध भाव होने से भगवती जिंदगी नहीं दे देती है। वह लेती भी है और लीला को आगे बढ़ा भी देती है। हम अक्सर राज्य के द्वारा शेर और बाघ को पाल कर उन्हें उनका भोज्य देकर हिंसा करते हैं। राज्य के नाम पर जीवन मांग कर हिंसा करते हैं अपने स्वार्थ के लिए हिंसा करते हैं पर भगवती के लिए नहीं देना चाहते। कृष्ण को संकोच नहीं है वे अगर शक्ति के विग्रह से प्रेम में समर्पण कर सकते हैं तो न्याय के लिए न्याय के मानदंड पर चल कर भगवती को उसका समर्पण दे सकते हैं।
सहदेव को समझने में देर नहीं लगी कि द्रोण उसके विपक्ष में होकर भी उसे अपने इस प्रेम में सघर्ष में भी भगवती की उसी मधुर साधना के सत्य को कह रहें हम अपनी बलि खुद हीं नहीं देते अपने कर्त्तव्य पर चलते हुए दूसरों की बलि रूप में खुद को भी स्वीकार करते हैं। गांगेय ने जब अर्जुन, अभिमन्यु और सहदेव को आक्रमण लिए देखा तो उन्हें यह अनुभव हो गया एक उनका वह रूप और तेज है जिसमें कभी उन्हें प्रेम का अहसास हुआ था। एक उनका वह रूप है जो प्यार को जीकर हो सकता था और एक वह रूप है जिस मधुमति का ज्ञान तो था परंतु जिसे वह नहीं जी पाये और वह जी रहा है। जिनके जीने के लिए अब वे रूकावट के चरम रूप पर जा चुके हैं।
महाभारत काल का महान धनुर्धर अर्जुन सव्यसाची था। यही एक कला था जो गांगेय भी नहीं अपना पाया था। परंतु अपने पूरे जीवनकाल में सिर्फ दो बार हीं अर्जुन ने इसका प्रयोग किया था। पहली बार पांचाली द्रोपदी के लिए उसके स्वयंवर में और दूसरी बार पाण्डवों के जीत में पर्वत बने गांगेय पर अब करने जा रहा था। पांचाली के लिए कृष्ण ने धनुर्वेद की अद्वैती परीक्षा रखी थी। कृष्ण जानते थे पांचाल नरेश द्रुपद उन्हें हीं द्रौपदी के लिए चाहते है। कृष्ण ने उस परीक्षा का आयोजन किया जिसमें उनके गुण को समाहित कर हीं नियति से सफल हुआ जा सकता था। मछली के आँख को तीर से भेदना था। लेकिन उसे जल की परछाई में देखकर ऊपर सीसे पर लगे मछली की आँख पर लक्ष्य को पाना था। पानी की परछाई गहराई को आभासित करता है। प्रतिबिंबित नहीं करता। सीसा कहीं ज्यादा प्रतिबिंब बनाता है। जब एक सैलून में जाने पर दो सीसा दृश्य की एक श्रृंखला बना देता है। अर्जुन जब धनुष को लिए खुले आकाश पर अवलंबित लक्ष्य के लिए पानी के सरोवर के बीच में आधार पर खड़ा हुआ तो एक मछली के पानी में और सीसे में अनेक रूप को पाकर अवाक रह गया। यह शिक्षा तो उसने इस रूप में पाया हीं नहीं था। उसे इतना हीं याद रहा जब उसने शिक्षा लेते हुए चिड़िया की आंख को ल्क्ष्य भेद किया था। गुरु द्रोण ने उसे यही कहा था। ल्क्ष्य हमेशा द्वैत का गिर जाना होता है। जब मन के संशय और विकल्प गिर जाते हैं। ल्क्ष्य हीं ध्येय रूप होकर भागवत चिंतन बन जाए, तब तक रूक कर अपने को दैव पर छोड़कर जब लक्ष्य के प्रति खुद को छोड़ दिया जाए तब लक्ष्यभेद गति के अंतराल से नहीं होता बल्कि ल्क्ष्य के प्रति समर्पण से होता है। कृष्ण द्रौपदी के दक्षिण बैठे मंद स्मित के साथ थे। यज्ञ के तेज से उत्पन्न द्रौपदी के लिए यह स्वंयवर अगर कृष्ण ने रचा है तो यह सिर्फ विद्या का हीं परीक्षा नहीं है। यह स्त्री तेज के साथ पुरूष तेज की हीं परीक्षा नहीं है। यह पुरूष के सोम की, शीतलता की सांमजस्य की भी परीक्षा भी है। स्त्री अगर अबला की तरफ हो तो उसके साथ पुरूष का तेज हीं पर्याप्त था। स्त्री अगर लता हो तो वृक्ष की कठोर परूषता की जरूरत होती है। परंतु अगर स्त्री भी तेज से समन्वित हो तो वैसे पुरूष की जरूरत पड़ती है जो मजबूत तो हो लेकिन अपने भीतर एक लता की लचीलेपन को समेटे हुए हो। अगर कृष्ण ने कर्ण के लिए द्रौपदी को मना किया तो इसलिए मना नही किया की उसमें क्षात्र तेज नहीं था बल्कि इस लिए मना किया क्योंकि कर्ण में तेज इतना ज्यादा था जहाँ सोम नहीं रह गया था। अर्जुन ने नियति के इस मुकाम पर खड़ा होकर तेज को अपनाने के लिए स्त्री की कला (Feminine Art) का हीं सहारा लिया। दाहिने हाथ की अंगुलियों के मुकाबले में बाँये हाथ की अंगुलियों में कोमलता कहीं ज्यादा होती है। दाहिने हाथ से तीर को अगर तेजी से छोड़ा जाए तो तीर सीधा शक्ति से निकलता है लेकिन अगर अंगुलियों की कोमलता का इस्तेमाल कर अगर प्रत्यंचा को छूती हुए आहिस्ता छोड़ा जाए तो तीर घूर्णण करते हुए अपने भीतर शक्ति के साथ समय को भी समेटे हुए ल्क्ष्य पर आगे बढ़ता है। पांचाली के लिए कोमलता को ही अपने भीतर के तेज का फलक बना कर जब वह जल पर बने प्रतिबिंब के कई स्तर को देखा तो वह संशय की रेखा से घिर गया। लेकिन पानी में बने अपने प्रतिबिंब को देखकर उसे यह स्मरण हो आया वह स्वंय वेद के आचार्य द्रोण का प्रतिबिंब है। वह जैसे जैसे ध्यान में गया तो पानी में मछलियों की संख्या घट गई। मछ्ली का स्वरूप पांचाली का बनता गया। एक समय वह आया जब दूरी का प्रभाव चित्त से जाता रहा और काल का अंतराल भी खत्म हो गया। जब मछली भी रूप खोकर पांचाली भी भागवत निर्णय बन गई। तीर अर्जुन की अंगुलियों से छूट कर पांचाली का ल्क्ष्य भेद कर गई।
अब वहीं लक्ष्य भागवत निर्णय बन कर सव्यसाची का गांगेय को गिराने के लिए संधान बन बैठा। अर्जुन ने दांये हाथ से धनुष को क्षैतिज कर बाँए हाथ की अंगुलियों से बाण को धनुष के सेज पर गांगेय को गिराने के लिए सजाया। गांगेय को गिराने के लिए उनके रथ के संतुलन को तोड़ना जरूरी था। सहदेव ने दो तीर धनुष पर रखा एक बीच प्रत्यंचा पर और एक थोड़ी उससे ऊंची जगह पर ताकि रथ का पहिया एक साथ दो बार झटके खाकर टूटे। अभिमन्यु ने अपने दाएँ पैर को जमीन से टिका कर अपने बाएँ पैर को ठेहुने से मोड़ कर अपने बांयी हाथा को सीधा नीचे कर धनुष को लंबवत के बजाए क्षैतिज कर भीष्म के पैरों पर प्रहार किया। ताकि बांयी पैर से तीर निकले और दायीं पैर को घायल कर संतुलन को बिगाड़े।
गांगेय जिस राजगद्दी की सुरक्षा कर रहे थे उसे बिना कृष्ण के ऐश्वर्य के चुनौती दिए बिना वह संभव नहीं था। तीन महारथियों के सम्मिलित लक्ष्य को देखकर गांगेय को भी आखिरी आक्रमण की घड़ी समझ आ गई। उसने भी बाँए हाथ को सीधा कर केहुनी से 90 के कोण पर रखा, हथेली को 90 के कोण पर वहाँ से प्रत्यंचा के नीचे से ले जाकर रखा। लक्ष्य को अम्बा के सामने रखा। तीर को अंगूठे और दो अंगुलियों के बजाए दो अंगुलियों प्रत्यंचा से ऊपर ला कर रखा। तीन जगह से लक्ष्य का संधान करने बाण निकले। सबसे पहले अभिमन्यु का तीर गांगेय के बाँए ठेहुने से लगा और वहाँ का लगा तीर निकल कर दाहिने जङ्घा में घुसा। उसी समय सहदेव के तीर ने चलते रथ के पहिए को दो बार तोड़ कर असंतुलित किया। अर्जुन के तीर ने हवा में घूर्णण करते हुए रिवर्स स्विंग करते हुए गांगेय के वक्ष को बीच से दाहिने तरह धकेल दिया। गांगेय ने लड़खड़ा कर गिरते हुए भी अपने आखिरी तीर को लक्ष्य पर संधान कर हीं दिया। गिरते हुए अपने हस्तिनापुर को असुरक्षित छोड़ने के अहसास ने उसके चेहरे को आँसुओं से भरना शुरू हीं किया था कि एक शांत, स्थिर, जड़ गौरवशालिनी सौंदर्य के प्रवाह की छवि कौंध गई और गांगेय शून्य और नि:शब्द बन कर रह गया।
तीर धनुष से उछला अम्बा के रथ को पार करते हुए हवा में स्विंग लेते हुए कृष्ण के मोरपंख को भेद गया। जितना प्रधान सेनापति के इस एकतीर ने पाण्डव पक्ष को श्रीहीन किया उतना न पहले हुआ न बाद को महाभारत युद्ध में हुआ। इस कला को अपना कर सबके मूल भगवान कृष्ण को प्रतीकात्मक पराजय देने के पीछे कृष्ण के प्रति हस्तिनापुर का वैर था या गांगेय का व्यक्तिगत समर्पण हीं इस आखिरी रूप में हुआ था यह या तो कृष्ण हीं स्वयं जान सकते हैं या गांगेय हीं जान सकता था। लेकिन गांगेय एक प्रतिमा की तरह निश्चेष्ट जरूर हो गया।
22.
आचार्य द्रोण के प्रधान सेनापतित्व ने अगर अभिमन्यु की बलि ले कर गांगेय को संज्ञा में लाने का काम किया तो वह पृष्ठभूमि भी रच दिया जिसमें गांगेय के सामने हीं अम्बा के तीसरे जन्म की नृशंस हत्या हो गई। गांगेय की हीं तरह आचार्य द्रोण ने पाँच पाण्डवों की वध करने से इंकार कर दिया। दुर्योधन युद्ध के लंबा खींचते जाने से अधीर होता जा रहा था। बारहवें दिन दिन के युद्ध में आचार्य द्रोण ने युधिष्ठिर को बंदी बनाने की योजना तैयार की जिसके बाद पाण्डवों को युद्ध समाप्त करना पड़ता। अर्जुन नारायणी सेना के संहार के लिए व्यूह के मध्य में होकर दायीं तरफ बढ़ा। त्रिगर्त देश का राजा अर्जुन को दूर ले जाने में लगा हुआ था। व्यूह से आचार्य द्रोण मध्य में खड़े थे और वो पाण्डवों के बाँयी तरफ से आकर युधिष्ठिर को बंदी बनाना चाहते थे। जिस तरह द्रोण अर्जुन को दायीं तरफ भेज कर आगे से युधिष्ठिर की बायीं ओर जगह बनाने में लगे उसने अभिमन्यु को चौकन्ना बना दिया और अभिमन्यु भी व्यूह के मध्य से सीधा बाँयी ओर बढ़कर द्रोण के सामने आ गया। द्रोण को रूक कर सीधे आगे बढ़ने का हीं रास्ता बचा। लेकिन अभिमन्यु ने खतरे को उठाते हुए बाँयी ओर के काफी आगे आ गया। वह युधिष्ठिर के दायीं ओर की रक्षा तो नहीं कर सकता था परंतु अभिमन्यु के अकेले होने के बावजूद वह पार्श्व सुरक्षित हो गया था। वह द्रोण को वहीं से कौरव सेना की प्रगति को रोके हुए था। इस युद्धनीति का उसे लाभ भी मिला। जब द्रोण दाहिने ओर से आगे बढ़ा तो सुरक्षित समय पर अर्जुन के मध्य की तरफ बढ़ते हीं अर्जुन के बाणों की सुरक्षा ने द्रोण को असफल भी बना दिया।
अगले दिन स्वर्ग के देवता इन्द्र के मित्र राजा भगदत्त को अर्जुन को उलझाने की जिम्मेदारी दी गई। द्रोण ने चक्रव्यूह की रचना की। अभिमन्यु चक्रव्यूह में प्रवेश कर युद्धिष्ठिर को बंदी होन से तो बचा लिया। परंतु खुद को व्यूह के चक्र में उलझने से नहीं बचा पाया। ऐसा नहीं है कि वह अकेले चक्रव्यूह में घुसने से मारा गया। अकेले होने पर सम्मिलित आक्रमण के कारण भी वह नहीं मारा गया। अर्जुन, कृष्ण, भीष्म, द्रोण अकेले हीं चक्रव्यूह को तोड़ने में सक्षम थे। चक्रव्यूह में जब आक्रमण होता है तो यह एक लय का रूप ले लेता है। उस लय को तोड़ कर नहीं तोड़ा जा सकता। उस लय को तादात्मय कर हीं तोड़ा जा सकता है जैसे सम आने पर खुद हीं पहले हीं उसे पकड़ लिया जाए या अपने जीवन के मोह से ऊपर उठ कर आक्रमण किया जाए। जब अपने प्राण की नहीं बल्कि उन्हें हीं अपने प्राण की चिंता करनी पड़े। तब दुश्मन अचंभित होता है और आक्रमण का वह लय टूट जाता है। अभिमन्यु अर्जुन के द्वारा सुभद्रा के गर्भ में रहते हुए चक्रव्यूह के बारे में जाना था। परंतु वह आखिरी चक्र के तोड़े जाने का रहस्य नहीं प्राप्त कर पाया था।
अभिमन्यु की मृत्यु गांगेय के अपने हीं बालपन की मृत्यु थी। इस सूचना ने जमीं अश्क को पिघला दिया। ऐसा कोई भी पक्ष नहीं सुरक्षित दिख रहा था जो निश्चय यह कह सके कि वह हस्तिनापुर के भविष्य को सुरक्षित कर हीं देगा। गांगेय अपने बाणों के वेदना से जितना पीड़ा में नहीं था उससे ज्यादा इस अनिश्चितता से पीड़ा में गुजर रहा था।
चौदहवें दिन द्रोण ने द्रुपद की हत्या कर दी। द्रुपद के बदले की यज्ञ ज्वाला से उत्पन्न शिखण्डी के भाई धृष्ठद्युम्न ने समाधि की अवस्था में हीं पन्द्रहवें दिन द्रोण की हत्या कर दी। अठारहवें दिन अश्वथामा ने शिखण्डी की हत्या कर दी। शिखण्डी की मृत्यु हीं न हुई। अश्वत्थामा की फरसे से दो टुकड़े में शरीर सिर से विभाजित हो गया। और उस दिन उसकी आत्मा भी शायद विभाजित हो गया। दुर्योधन भी मारा गया। युधिष्ठिर हस्तिनापुर की राजगद्दी पर बैठ गया। गांगेय बाण की शर शैय्या पर पाने और खोने का निर्णय पा लेने पर आ गया। आज अब वह हस्तिनापुर की राजगद्दी की सुरक्षा से मुक्त हो चुका था।
23.
यह कितनों का सौभाग्य होता है कि खुद वासुदेव कृष्ण उसके अंतिम क्षण पर दर्शन दे रहे हों। जिस अंतिम स्मृति के लिए वृत्तियों से निवृत्त होकर पूरी जिंदगी जी जाती है वे हीं अंत समय में आश्वासन दे रहे हों। वो हीं विदाई दे रहे हों या स्वागत भी वही कर रहे हों। जब परिणाम हमारे नैतिक निर्णय का आधार नहीं होता। हमारी अंत:प्रेरणा हीं मूल्यांकन की कसौटी बनता है, तब अगर गांगेय अपने निर्दोष अंत:प्रेरणा से भागवत लोक का अधिकारी बना तो आश्चर्य नहीं करना चाहिए। दूसरों के अपराधों का गांगेय को उत्तरदायी तो बनाया जाता है परंतु गांगेय के निर्देशों के अवहेलना का हिसाब कहाँ किया जाता है। अपनी एकाकी पीड़ा लिए जब आत्मा का प्रवेश लिए बृहत्त आत्मलोक में जाता है तो रौशनी और वीणा के नाद में सारे विषाद को खो बैठता है। अपने प्रेम के प्रति ग्रंथि से निकल जाता है। कृष्ण के आत्मा में प्रवेश उसे अथाह करूणा से भर देता है। कृष्ण के प्रेम में निमग्न वह उस नाद के द्वार में जाता है जहाँ भगवती शक्ति नाद और लय की रचना से घिरी हैं। आत्मा को एक क्षण भगवती दुर्गा की झलक मिल जाती है जहाँ वीणा की ध्वनि भी एक कृष्ण की भगवती के प्रति समर्पण की गहरी आमंत्रण बन जाती है और उसे वहाँ अम्बा की स्मित लिए छवि मिलने लगती है। गांगेय को करूणा, प्रेम और आनंद का भाव अम्बा के प्रति संकल्प में मिल जाता है। जहाँ संपूर्ण अस्तित्व हीं सत, चित्त और आनंद हो वहाँ बिना आनंद के यह कहानी पूरी नहीं हो सकती है भले हीं उसके सामने भगवती हीं मुक्ति लिए हुए हों। वहाँ सिर्फ प्रश्न नैतिक निर्णय में अंत:प्रेरणा का नहीं रह जाता परिणाम का हो जाता है। वह अम्बा के जीवन के आनंद के हरण का उत्तरदायी तो था हीं। गांगेय की मृत्यु ने भले हीं अम्बा या शिखण्डी को तात्कालिक मुक्ति दी हो परंतु यह तो निश्चित था कि उसे शान्ति उपलब्ध नहीं हो पाई थी। वह जानता था अम्बा उसे स्वीकार नहीं कर पायेगी। परंतु अब वह अम्बा के आत्मा के पीछे जाएगा। अगर उसने स्वीकार कर लिया तो उसे उसके कई जन्मों से न मिलने वाला प्रेम मिल जाएगा। या जिस ठुकराहट का दंश उसने पाया है उसी तरह से गांगेय भी उस से ठुकराया जाएगा। अंबा की आत्मा त्यक्ता नहीं त्याग करने वाला भी बन जाएगा।
(यहाँ के बाद कहानी ऐतिहासिक आधार से अलग हट कर, कल्पना को आधार बना साहित्यिक संभावना को मनोरम रूप में प्रस्तुत कर रही है।)
24.
आजकल काशी में लास्य की धूम मची कही जा रही है। मानो शिव का वैराग्य हीं सौन्दर्य धारण कर आ गया हो। काशी के घाट एक तरफ जहाँ श्मशान की महाशांति लिए बैठे हों वहाँ प्रियवदंबा की कला भी उसी रंगमंच पर भास्वर हो उठी थी। जहाँ कालेज के दिनों में उसके पास लड़कों का जमघट तो लगा पर प्रियवदंबा के प्रियवदंबा के नाम को कोई ले नहीं पाया। एक सौम्य हीं उस नाम में डूब कर ले पाया। लेकिन वह भी विलंब के साथ। इसलिए वह उसके साथ तो रह गया। उसे उसके साथ रहने का अधिकार मिल गया पर सिर्फ साथ रहने का हीं। वह भी उसके अशांत मन का साथी नहीं बन पाया। वह अशांत मन जब रंगमंच पर उतरा तो विद्युत बन कर चेतना में छा गया। एक बिजनेस एम्पायर की इकलौती मलिका शाम के बाद अपने बिजनेस से बिल्कुल अलग हो जाती है। अगर एक मलिका के अनुरूप वह नीले सूट में खुले बालों के साथ सोफे पर दृढ़ता की कसौटि होती थी तो उसके बाद वह सिवाय श्वेत वस्त्रों के अलावे वह कभी किसी को नहीं दिखी। कहते हैं उसके बंगले में आठ बजने के बाद किसी का भी प्रवेश वर्जित है। उसकी परिचारिकाएं भी उसके कमरे में नहीं जा सकती। कहते हैं उसके सिरहाने हीं शिव की मूर्ति है जो आज भी सती के चिता की राख समेटे है। प्रियवदंबा उस शिव को आज भी श्मसान के भभूत का महाप्रसाद जरूर चढ़ाती है। आज भी उसके ललाट पर वही भभूत प्रसाद बन कर चढ़ा करता है। जब रात गहराती है तो प्रियवदंबा के पायल सिन्थेसाइजर के लय पर शिव के सामने शिव का वैराग्य के रूप में नाच उठते है। जब प्रकृति राग ललित के स्वर में अधूरे प्रेम और आध्यात्मिक प्यास को स्वर देता है तो वह पसीने से लथपथ होकर पिंड की ऊर्जा को ब्रह्मांडीय ऊर्जा से मिलाने शिव के ध्यान में उतरती है। कहा तो यह भी जाता है कि वह आजकल ताई ची का भी अभ्यास कर रही है। कलिंगरा, रामकली, भैरव और भैरवी बिना सुर दिए उसके जिंदगी से गुजर जाते हैं। वह बिना बारह बजे से पहले अपने सबसे ऊपरके माले के दफ्तर में नहीं आती है। सीसे के दरवाजे से रास्ते में दुनिया को भागते देख कर वह आज भी इस भागदौड़ को नहीं समझ पाती।
अम्बा का जो मन सबसे ज्यासा गांगेय के प्रति हिंसा से भर उठा था वह तो गांगेय की मृत्यु के बाद शिखंडी के रूप में मुक्त हो गया। परंतु जो अम्बा का मन आकर्षण से भरा हो कर वंचित हुआ था वह प्रियवदंबा के रूप में ढ़ला था। अम्बा का जो मन कला में रमा हुआ आकर्षण से लिप्त होकर भी कटुता से बचा रह गया था वह प्रियांका का रूप में साकार हुआ था। दोनों के रूप में ज्यादा अंतर नहीं था। प्रियवदंबा और प्रियांका की ऊचाई बराबर हीं थी। जो सामान्य के हिसाब से अच्छा था। प्रियवदंबा का चेहरा गोलाई लिए हुए था। उसकी नासिका छोटी थी और उसके होठ पतले और ललाई लिए हुए थे। उसके चेहरे में स्वर्णाआभा थी। प्रियांका में एक भोलापन था। उसके चेहरे में हल्की लंबाई थी। उसकी आंखे बड़ी थी। होठ हल्के भरे और गुलाबी थी। वह प्रियवदंबा की तरह शीघ्रता से निर्णय नहीं ले पाती थी। वह दूसरों के भावनाओं को ध्यान में रखती थी। अगर प्रियवदंबा नृत्य और ध्यान की तरफ झुकी एक समृद्ध विरासत की स्वामिनी थी तो प्रियांका पाश्चात्य संगीत के शास्त्र की शिक्षा लिए गाने के रोग की शिकार थी।
25.
आंद्रेय आर्द्र आया तो था दिल्ली में रंगमंच के लिए पर वह प्रियांका के साथ वह संगीत में चला आया। वह गायकी के मुकाबले ड्रम के लय में खोता चला गया। लेकिन इस खोने के भाव ने उसे अपने भीतर की तलाश, अपने भीतर की प्यास से मिला दिया। प्रियांका के साथ रहकर वह लय में बधी जिंदगी से निकल कर प्रियांका के सुर की दुनिया में चला आया। लय अच्छे हैं पर वे संपूर्ण नहीं है। आदमी खुद को जितना सुर के भीतर खोज पाता है उतना सिर्फ लय में नहीं खोज पाता। जब तक वह प्रियांका के पास नहीं होता वह प्रियांका के पास चला जाता है। लेकिन आजकल उसे लगता है कि आकर्षण प्रियांका के भीतर से है परंतु वह संपूर्ण रूप से प्रियांका के पास हीं नहीं है। लेकिन वह प्रियांका के बाहर अनुभव नहीं करता। रॉक के सुर के भीतर उसे एक शांत पिपासा के सुर की ध्वनि गूंजने का उसे अहसास होता है। ऐसा भी कहा जाता है कि आजकल वह हवाईयन गिटार के सुर को सुनने जाने लगा है। प्रियांका आंद्रेय के इस भीतर के बदलाव को अहसास कर चुकी है, अब ना तो वह सामान्य मित्र हीं रहा है, वह उसे ज्यादा समय देने लगा है। लेकिन यह बढ़ी हुई नजदीकि कहीं न कहीं उसके पास हीं खिंचाव को भी लिए हुए है। लेकिन इन सबके बावजूद भी प्रियांका भी एक समीपता का अनुभव करने लगी है।
26.
प्रियांका और आंद्रेय तो ट्रूप के साथ कोलकाता चले थे प्रियांका के कॉन्सर्ट के लिए लेकिन ना जाने शिव की नगरी काशी के वातावरण ने क्या प्रभाव डाला आंद्रेय प्रियांका के साथ आगे नहीं जा सका। सुबह के साढ़े चार बजे हुए थे, अस्पष्ट से ध्वनि कहीं से आ रहे थे और वह शिव के सामने निस्तब्ध खड़ा था। काशी धर्म नगरी कहीं जाती है। लेकिन अपनी तंग गलियों में ना जाने कितने फैलाव को समेटे हुए है। जहाँ दिल्ली के वातावरण में सुबह देर से उठना हीं सामान्य है। जहाँ किसी के लिए देर सुबह हीं घर से निकलना सामान्य था वही आज वह अपने घर के शिव से बाहर निकल कर सात साल के व्रत को पूरा कर वह आम्रफल को भभूत से लपेट कर विश्वनाथ को अर्पित करने क्रीम कलर में अपने खुले गीले बालों के साथ आई हुई थी। चेहरे की उखड़े हुए आभिजात्य के साथ उसके प्रवेश ने शिव की छवि की तरह हीं उसे भीतर से आंदोलित कर दिया। प्रियवदंबा आकर चली गयी थी। उसने एक निगाह डाली और वह शांत रूप से पूजा कर चली गयी। आंद्रेय खड़ा रह गया। काफी देर तक वह वहीं खड़ा रह गया। कुछ देर बाद हीं उसे अपने भीतर कुछ उतरने का अहसास हुआ।
वह अगले दिन फिर आया लेकिन प्रियवदंबा को न आना था न आई। वह आगे कोलकाता के लिए नहीं जा पाया। आम्रफल को भभूत में लपेटा जा सकता है इसने उसे अंतर तक चलायमान कर दिया। एक सप्ताह तक वह काशी की गलियों में घूमने के बाद भी वह प्रियवदंबा के सत्य के तरफ खींचा चला गया। वह समझ नहीं पाता है समय क्यूँ ठहरा हुआ उसे लगता है। जो खींचाव उसे प्रियांका के पास ले जाते थी वही उसे क्यूँ उसे उस क्रीम कलर में खुले बालों के पास पहुँचा देता है। उसे इस रूप में प्रियांका की छवि और प्रियांका में प्रियवदंबा की छवि दिखाई पड़ती है।
27.
एक सप्ताह तक काशी की प्राचीन गलियों में घूमने के बाद वह यही समझ पाया कि उसका इन गलियों और प्रियवदंबा से एक रिश्ता जरूर है। श्मशान के भभूत ने उसे श्मशान के कई चक्कर जरूर लगवा दिए। उसे शव के न जलते रहने पर भी एक जिंदा शव के जलने की अनुभूति जरूर जाग गई थी। प्रियवदंबा के सामाजिक परंतु नीरव एकांत जीवन में उसे प्रियवदंबा के बंगले के सामने जरूर ला दिया। जितना हीं वह प्रियांका के बारे में सोचता उतना हीं वह प्रियवदंबा के निकट चला जाता। आज वह अपने विगलित अहं के साथ प्रियवदंबा के सामने खड़ा था। प्रियवदंबा को मंदिर में देखना अलग था। आज वे दोनों आमने सामने थे। वह खड़ा था और उसके भीतर कुछ घूमने लगा था जिसे वह स्पष्ट नहीं समझ पाया। वह इतना हीं समझ पाया जैसे वह खुद को ठुकराये जाने के लिए एक खींचाव का अनुभव कर रहा है। एक अहसास तो प्रियवदंबा के भीतर के अंबा के में जाग चुका था जिसे वो चाह कर भी इगनोर नहीं कर सकती। दोनों को सम्हलने में वक्त लगा लेकिन तब तक प्रियवदंबा श्मशानवासी शिव के सामने जा चुकी थी।
आंद्रेय लौट चुका था, लेकिन जिस तरह शाम के श्याम बादल बरसने के लिए हवा के साथ बढ़ने लगे वैसे वैसे वह स्तब्ध प्रियवदंबा की तरफ जा चुका था। उसे जब समझ आया तबतक खुले दरवाजे के सामने प्रियवदंबा उसके आगे खड़ी थी। उसने आंद्रेय से मिलने से इंकार कर दिया। उसने आंद्रेय के विषण्ण आँख में लिखे संदेश को पढ़ लिया था। जब दृढ़ गंभीर चेहरे के साथ प्रियवदंबा दरवाजे को बंद करने के लिए आगे बढ़ी तो आंद्रेय को बिना कुछ कहे हीं सारी बात कहने और उसका जवाब पाकर दरवाजे से बाहर जाना पड़ा।
वह बाहर तो निकला पर प्रियवदंबा से बाहर नहीं निकल पाया। जिस तरह सारे प्रश्नों और प्रयत्न का त्याग कर बुद्ध अश्वत्थ वृक्ष के नीचे बैठ गये थे वैसे हीं बारहमासी आम्र के मंजर से लदे छोटे छोटे फल को लिए वृक्ष के नीचे आंद्रेय भी बैठ चुका था। आज वह भींगने के गहरे प्यास लिए बैठा था। अगर आंद्रेय बाहर पानी के थपेड़े में भीग रहा था तो खिड़की से सटे बिछावन पर अंधेरे में वह अपने भीतर चल रही बिजली में भींग चुकी थी। जब आंद्रेय भींगते रहने के बाद भी नहीं हटा तो प्रियवदंबा विचलित हो चुकी थी। यह कहना मुश्किल है उस दिन काशी में बादल से बिजली ज्यादा गिरी या प्रियवदंबा के भीतर ज्यादा बिजली चमकती रही। अगर खंभों के तारों ने बिजली को धरती में न लिया होता तो यह कह पाना मुश्किल होता कि आंद्रेय क्या उन बिजली से बच पाता। वह व्योमकेश के चरणों में ध्यान में जा बैठी थी। जिस ललाट के मध्य में वह पूरे दिन एक दबाव अनुभव कर रही थी उसने जल्द हीं उसे ध्यान में सारे सत्य को सतह पर ला दिया। सत्य उसके सामने था। उसे विरक्ति भी नहीं हुई परंतु एक तीव्र असंगता ने उसके भीतर एक जगह बना ली। उसके सामने अब गांगेय और आंद्रेय दोनों का सत्य सामने था।
पानी में सिर्फ आंद्रेय का शरीर हीं नहीं धुला सत्य भी धुल कर उसके सामने खड़ा हो चुका था।
28.
प्रियांका लौट आ चुकी थी। अब वह अपने जीवन में आंद्रेय के अभाव को समझ चुकी थी। बिना कुछ कहे वह प्रियांका के साथ दिल्ली जा रहा था। यह भी सही है कि वह प्रियांका के साथ संपूर्ण रूप से जा रहा था। दोनों हीं चुप जा रहे थे। मेरठ के पास से गुजरते हुए एक पतली दुबली सी संन्यासी युवती सबकुछ भुला कर शांति अपनाने की बात कर रही थी। साधना हीं मानो सबकुछ भुलाने की हो। ध्यान का केन्द्र उससे अलग नहीं था। सारा जनसमूह उसके वक्तव्य को कितने ध्यान से सुन रहा है-प्रियांका ने कहा। उसके कथ्य को या उसे ध्यान का केन्द्र बना लिया है-आंद्रेय ने कहा। यह सच है आंद्रेय संपूर्ण रूप से प्रियांका के लिए जा रहा था। परंतु क्या यह कहा जा सकता है कि वह हमेशा के लिए जा रहा है। क्या वह अगले जन्म में यहाँ या अम्बा जहाँ होगी वह वहाँ नहीं जाएगा। भींगे दरवाज के पल्ले को पीछे धकेल कर एक संदेश को रख कर वह आगे मुड़ कर हाथ को पीछे कर तर्जनी और मध्यमा से दो बार नॉक कर वह जा चुका था। भींगा दरवाजा पुन: अपने स्थिति पर आ गया और संदेश अब उन हाथ में था जिसके लिए उसे रखा गया था। श्वाँस को धीमा कर स्थिर रख कर ध्यान करने वाली श्वाँस तेज हो चुकी थी। श्वाँस की लय के साथ प्रियवदंबा के वक्ष भी अस्थिर हो चुके थे। ललाट पर स्वेदकण के साथ उसने पढ़ा-
"जिसे कभी हमने ठुकराया था आज उसके दर पर खड़ा हूँ, उससे प्यार करने को, उससे ठुकराये जाने को। उससे स्वीकार किए जाने को। तुम्हें हक है हमें ठुकरा दो। हम फिर आयेंगे तुम्हारे लिए तुम्हारे अगले जन्म में भी। यह सिलसिला है कई जन्मों का, आया हूँ तुम्हें प्यार करने को, तुमसे ठुकराये जाने को, तुमसे स्वीकारे जाने को।"
प्रियवदंबा ने अस्पष्ट स्वर में खुद से कहे बिना नहीं रह पायी-
"कई जन्मों की प्यास है ये। दिन, महीने, साल नहीं कई जन्म की प्यास है ये। तुम्हें भी आना है मेरे लिए। मुझसे ठुकराये जाने के लिए। मुझसे प्यार करने के लिए।"
संदेश टुकड़े में बँट चुका था और वो ठुकड़े प्रियवदंबा पर गिर हीं नहीं रहे थे उन ठुकड़ों से प्रियवंदबा स्नान कर रहीं थी। वे ठुकड़े नहीं थे, संदेश भी नहीं थे, कई जन्मों की आहत तृषा की संपूर्णता भी थी। प्यार की संपूर्णता क्या सिर्फ स्वीकारे जाने में हीं है। कई बार प्यार ठुकड़ाये जाने में संपूर्ण होता है। प्यार के प्यार होने में संपूर्ण होता है। प्रियवदंबा नृत्य की मुद्रा में आ चुकी थी। उसके एक कदम आगे थे बाँया हाथ नीचे था तो दाहिना हाथ सिर के ऊपर उठ कर ठुकड़ों की उसके ऊपर वर्षा कर रहे थे। वह हॉल में आ चुकी थी। वह दोनों बॉहों को फैलाकर धीरे धीरे चक्कर लगा रही थी। आवृत्ति तेज होते जा रही थी। उसके एक पैर हवा में थे। वह घूमते हुए तलवे से भी आगे सिर्फ अपने अंगूठे पर संतुलन पर थी। उसकी इस परिपूर्णता में उसके अंगूठे का पुराना नाखून जगह को रिक्त कर गया था।
प्रियवदंबा प्यार को ठुकड़ा कर अकेले होकर भी किसी के फिर उसके लिए आने के अहसास से संपूर्ण थी।
सौरभ कुमार