रस-ब्रह्म साहित्य संगीत

रस-ब्रह्म

सृष्टि रसमय है। ब्रह्मांड रसमय है। अथातो ब्रह्म-जिज्ञासा का समाधान रस है। रस तो रस हैं। अपने में न वे अच्छे हैं न बुरे हैं। उनकी मात्रा और संयोग से वे हमारे अपने और हमारी मानवता और सारी सृष्टि में हीं अच्छे-बुरे बनते हैं। उसी तरह हमारे ब्रह्मांड में रस Chemical की बनावट है। हमारे शरीर में हीं कई तरह के Chemical हैं। हमारें मस्तिष्क और शरीर में भी कई हार्मोन्स निकलते हैं। ये मस्तिष्क तथा शरीर में निकलने वाले हार्मोन्स हमारे मन को नियंत्रित करते हैं। मन में स्थायी भाव हैं। उनके भीतर संचारी भाव हैं। जो मिलकर सफल रस का निर्माण करते हैं। संगीत के स्वर भी रस का उद्रेक या शरीर में भाव की अनुभूति कराते हैं। एक काव्य में सफल साहित्य एक रस से नहीं होता है। संगीत में भी कम से कम पाँच स्वर लगने आवश्यक हैं। उसी तरह महाकाव्य या सिनेमा में कम से कम पाँच रस का सही समन्वय या औचित्य उसे सफल बनाता है।

संस्कृत और हिन्दी साहित्य में औचित्य को महत्व देकर भी उसे काव्य या साहित्य की आत्मा का पद नहीं दिया गया। जिस तरह किसी व्यक्ति का होना एक बात है यह उसकी आत्मा है। और वह व्यक्ति या आत्मा अच्छा या बुरा है यह तो सिद्ध औचित्य से हीं होता है। 

साहिय या संगीत उसी रस से परम ब्रह्म या परमानंद को पाने की अनुभूति है। इनका सृजन या आस्वादन या अध्ययन भी इस रूप में आवश्यक है।

सौरभ कुमार 




सृष्टि रसमय है। ब्रह्मांड रसमय है। अथातो ब्रह्म-जिज्ञासा का समाधान रस है। रस तो रस हैं। उनकी मात्रा और संयोग से वे हमारे अपने और हमारी मानवता और सारी सृष्टि में हीं अच्छे-बुरे बनते हैं। साहिय या संगीत उसी रस से परम ब्रह्म या परमानंद को पाने की अनुभूति है। इनका सृजन या आस्वादन या अध्ययन भी इस रूप में आवश्यक है।

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