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प्रकृति में पितरों की पीढ़ी के बीच दोष और आशीर्वाद की गुणसूत्र व्यवस्था

प्रकृति में पितरों की पीढ़ी के बीच दोष और आशीर्वाद की गुणसूत्र की अपनी व्यवस्था है। प्रकृति में गणना (गिनती) की अपनी व्यवस्था है। चाहें यह संख्या के रूप में हो, अक्षरों के रूप में हो, सा, रे, गा, मा, के रूप में हो, रंगों के रूप में हो, आनुवांशिक जीन्स के रूप में हो या जन्म पत्रिका या हाथ, ललाट या सामुद्रिक के ग्रहों के रूप में हो। हर व्यक्ति कुछ गुण और दोष के साथ आता है। यह उसके व्यक्तिगत गुण भी हैं और किन्हीं शब्दों में आनुवांशिक गुण भी है। लेकिन पितरों से वह गुण-दोष वह अपनी अभीप्सा के अनुसार हीं ग्रहण करता है। उसकी और पितर की सामंजस्य से ही उसकी संभावना का निर्माण होता है। यहाँ एक दिलचस्प प्रसंग आता है कि भारत की सनातन धर्मी जनता पूर्वज की सात पीढ़ी या वंशज की सात पीढ़ी का विशेष ध्यान रखती है। यह एक साधरण गणित को लेकर चलती है। इसे ऐसे समझे अगर किसी में  उसकी 100 प्रतिशत संभावना है तो 

पहली पीढ़ी में 100 प्रतिशत 

लेकिन दूसरी पीढ़ी में जाकर वह 50 प्रतिशत  

तीसरी पीढ़ी में वह 25 प्रतिशत

चौथी पीढ़ी में वह 12.5 प्रतिशत 

पाँचवी पीढ़ी में वह 6.25 प्रतिशत

छठी पीढ़ी में वह 3.125 प्रतिशत

सातवी पीढ़ी में वह 1.56 प्रतिशत 

उसके ऊपर जाकर वह 1 प्रतिशत से भी कम या नगण्य या गणना के अयोग्य हो जाती है या वह गुण-दोष या शाप-आशीर्वाद किसी पीढ़ी के द्वारा वहन या वाहित होकर हीं संचारित होता है।

इसी को दूसरे रूप में भी देखा जा सकता है कि अगर किसी में कोई संभावना 1 प्रतिशत है तो 

पहली पीढ़ी में 1 प्रतिशत

दूसरी पीढ़ी में 2 प्रतिशत

तीसरी पीढ़ी में 4 प्रतिशत

चौथी पीढ़ी में 8 प्रतिशत

पाँचवी पीढ़ी में 16 प्रतिशत

छठी पीढ़ी में 32 प्रतिशत

सातवी पीढ़ी में 64 प्रतिशत

उसके अगले पीढ़ी में 100 या उससे भी ऊपर चला जाता है।  प्रकृति की अपनी व्यवस्था है। यह 1 और 100 को संतुलित करती रहती है। हमारे गुणसूत्र की संख्या भी संभवत: थोड़ी- थोड़ी अलग होती है।

इसीलिए अपने कर्मों को पीढ़ियों के बजाए अपने द्वारा ही भोग का मान्य सिद्धांत रहा है। पीढ़ियों द्वार अपने समान गुण-दोष का वितरण का सिद्धांत है। पितरों की पूजा द्वारा इसी गणना का व्यावहारिक रूप दिया जाता है। यहाँ एक कथा दिलचस्प हो सकती है। एक बार एक बोद्धिधर्म से एक राजा ने पूछा ये जो मेरे द्वारा इतने विहार बनाये गए हैं, दान दिये गये हैं, कल्याण के काम किये गये हैं क्या इन से मुझे पुण्य की प्राप्ति हुई है। बोद्धिवर्मण ने कहा नहीं इनसे वास्तविक पुण्य की प्राप्ति नहीं हुई है। वास्तविक पुण्य ज्ञान की उपलब्द्धि से होता है। इसमें इन लाभदायक कर्मों से तुम्हें सहायता मिली है। इसी तरह पितरों की पूजा से  सहायता मिलती है। व्यक्ति की मुक्ति भारतीय परंपरा में ज्ञान होने से मिलता है। यह वेद - बुद्ध समन्वय का मार्ग है।


शुभमस्तु 

सौरभ 


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