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प्रकृति

‘सर्व खल्विदमेवाहं नान्यदस्ति सनातनं’ 

‘सब कुछ प्रकृति हीं है और वही सनातन भी है’

(श्रीमद्देवीभागवत 1/15/52)

"यह प्रकृति-ब्रह्म अचेतन से चेतन और परमात्म स्वरूप से परमेश्वरी है" 

PrakritiDharma: Aaj kaa Maanava Dharma
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प्रकृति ज्योतिष

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Ras-Brahm-Sahitya and Music

रस-ब्रह्म

सृष्टि रसमय है। ब्रह्मांड रसमय है। अथातो ब्रह्म-जिज्ञासा का समाधान रस है। रस तो रस हैं। उनकी मात्रा और संयोग से वे हमारे अपने और हमारी मानवता और सारी सृष्टि में हीं अच्छे-बुरे बनते हैं। साहिय या संगीत उसी रस से परम ब्रह्म या परमानंद को पाने की अनुभूति है। इनका सृजन या आस्वादन या अध्ययन भी इस रूप में आवश्यक है।

प्रकृति धर्म : एक मानवता की ओर

प्रकृति धर्म : एक मानवता की ओर ,  `रामकृष्ण परमहंस : যত মত - তত পথ। जितने मत उतने पथ।' `आचरण की सभ्यता '

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