Prakriti Dharma

भारतीय प्रकृति धर्म 

प्रकृति धर्म भारत की उस दृष्टि से निर्मित है जो सनातन है तथा जिसकी चर्चा भारतीय तथा गैर-भारतीय मनीषी करते रहे हैं। जिस धर्म की प्रतीक्षा की जाती रही है जो सागर/ नदी से उत्पन्न जीवन की भावना समेटने वाली रही है। धर्म के एक अंग के रूप में प्रकृति भारत तथा भारत से बाहर हमेशा रही है। लेकिन उस धर्म की आवश्यकता रही है जिसके केन्द्र  और शीर्ष में प्रकृति रही हो। यह प्रकृति धर्म उसी भावना से उद्भूत है। यहाँ  प्रकृति सत् चित् आनंदी है। यह रस ब्रह्म स्वरूपा है तथा जिसे ब्रह्म कहते हैं वह प्रकृति यही है। महाप्रभु वल्लभाचार्य ने ‘पुष्टि’ पोषण की बात की थी। वह पोषण प्रकृति हीं प्रदान करती है। वह गर्भस्वरूपा है। गरबा इसी गर्भ का प्रसिद्ध रूप है। यह प्रकृति माँ गर्भ के भीतर तथा बाहर सर्वत्र पोषण प्रदान करती है। हम जानते हैं ‘कुतूहल’ जिज्ञासावश हीं हम माँ से दूर जाते हैं। भटक जाते हैं तो प्रकृति ब्रह्म क्या कर सकती है। हमारा पोषण हम खुद हीं माँ से अवरोध लाते हैं। यह प्रकृति असीम है अत: वह सिर्फ माँ रूप में ही नहीं बँधी है। वह सर्वस्वरूपा है। पोषणदायिनी है। शंकराचार्य इस माया को समझ गये थे। उन्होंने इसके आंतरिक तत्व को समझा था। उस रस तक पहुँच गए थे अत: उन्होंने कहा कि ज्ञान हो जाने पर मुक्ति हो जाती है। उन्होंने कृष्ण के द्रष्टा-साक्षी भाव के महत्व को समझ लिया था। कर्म की उन्होंने उपेक्षा नहीं की। निर्माण के लिए कार्य करते रहे। वो जानते थे अगर ज्ञान नहीं फैला तो बंधन हीं हमें मिलेगा। प्रकृति गतिशील है। इसे बाँध कर उसमें विकास निर्माण करने की चेष्टा का भयानक परिणाम होगा जैसा किसी नदी पे बाँध बाँधने के रूप में होता है। बाँध कि जितनी बड़ाई की जाए बाँध के एक ओर जमाव भी होता है और वो बाँध टूटे तो वो एक खतरनाक टाईमबम भी साबित होता है। एक साथ आत्मा और शरीर दोनों को बाँध कर निर्माण का बाँध बनाना सहज नहीं है। आत्मा की गति अलग है। शरीर की अलग है। दोनों की गति अलग है। एक ही मानक एक साथ दोनों को लगाना दूर की कौड़ी है। सहज रहो तो शरीर-प्राण-मन-आत्मा सब की मुक्ति सहज है। इन्हें एक साथ बाँधना यही मोह और तृष्णा है। अज्ञान का कारण बन सकता है। हमें बाँधना नहीं है। पूर्ण होना है। 

सौरभ कुमार


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