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प्रकृति ज्योतिष

प्रकृति ज्योतिष उस प्रकृति धर्म से चालित है जो प्रकृति परमाणु स्वरूपा भी है और मानव स्वरूपा भी है। यही ग्रह भी बनाते हैं, नक्षत्र भी बनाते हैं और हमारे संस्कार, प्रारब्ध और कर्म तथा (पुद्गल रूप में) हमारे भोग को भी बनाते हैं। हमारी ज्ञान सीमा हीं अंतिम नहीं है। हमारी अंतिम ज्ञान सीमा के परे कारण से ज्योतिष की उपलब्धि हुई है। यह हमारे अहंकार के गलने से प्राप्त होने वाली विद्या है। विद्या अमृततुल्य है। यह हमें अमरता देती है जो भले हीं बँधी हुई हो यह शुद्ध मुक्त है। किसी न किसी रूप में ऊर्जा एक रूप में जरूर बची रहती है। और वही हमारा अस्तित्व है। जो बिंदु भी हो सकता है छोटे रूप में और प्रभु भी हो सकता है विराटता में। ज्योतिषी कभी सर्वज्ञ नहीं हो सकता है। यह सिर्फ हमारे अहंकार को गलाने में मदद दे कर अस्तित्व के निर्माण में सहस्वरूप में लगाने वाला होता है। हमें व्यवहार की सही दिशा दिखलाने वाला होता है। जब क्षण के कितने सूक्ष्म रूप गुजर सकते हैं जिन्हें सूक्ष्म घड़ियों में देखा जाता है तो ज्योतिषी काल और कर्म की उतनी गहरी विवेचना नहीं कर सकता। गहरी विवेचना स्वयं अंतर् में  बैठ कर हीं किया जा सकता है। ज्योतिषी एक शुभेच्छु और मददगार हीं होता है। वह विवेकवान हो सकता है। हमें अशुभ से बचा सकता है। शुभ की ओर प्रेरित करनेवाला होता है। चमत्कार की अपेक्षा हमें सिर्फ ठगाती है। और हमें खुद ठगाने से बचाना चाहिए। अपने कर्म तथा संस्कार को अनुकूल बनाने पर ध्यान देना चाहिए। 

शुभमस्तु 

सौरभ कुमार 


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