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प्रकृति-ब्रह्म

‘सर्व खल्विदमेवाहं नान्यदस्ति सनातनं’ 

‘सब कुछ प्रकृति हीं है और वही सनातन भी है’

(श्रीमद्देवीभागवत 1/15/52)

"यह प्रकृति ब्रह्म अचेतन से चेतन और परमात्म स्वरूप से परमेश्वरी है" 


यह प्रकृति प्रजनन स्वरूपा है, यह स्वयं गर्भ स्वरूपा है और यही खुद उसका पोषण करने वाली है। यह प्रकृति है अर्थात स्वयं कृति है, लेकिन सत्स्वरूपा होने के कारण इसका कोई आदि नहीं है। यह खुद ही आद्या शक्ति है। सभी भगवत्ता और ईश शक्तियाँ इसी की हैं। इसी से उत्पन्न भगवत्ता और ईश्वरत्व को अनुभव करती हैं। प्रकृति हीं आदि कारण है। प्रकृति के नियम को हीं वेद में ऋत् कहा गया है। जिस तरह एक माँ में ममता होती है, एक स्त्री में ममता होती है वैसी ही प्रकृति के नियमों में आध्यात्मिकता होती है। हो सकता है हम उन नियमों को पूरी तरह नहीं समझ पायें या आज नहीं समझ पायें। लेकिन प्रकृति कार्य करने के लिए यह स्वयं कारण स्वरूपा है। 

यह प्रकृति का बनाया हुआ मानव शरीर सामान्य शरीर नहीं है। यह आध्यात्मिक उन्नति को प्राप्त करने का साधन है। यह किसी एक देश, भाषा, जाति, रंग में बँधा हुआ नहीं है। मानव शरीर से निकलने वाले विभिन्न रसायन या हार्मोन इसे एक पशु नहीं रहने देते। इसे संस्कृतियाँ विभिन्न विकास चक्र से संबंधित करके देखती हैं। सत्य सपूर्ण मानव जाति का होता है। यह सिर्फ इसी पृथ्वी का नहीं होता। ना हीं सिर्फ इस मानव स्वरूप के जीवन का होता है। आध्यात्मिक और प्रकृति का नैतिक सत्य तो सब काल और सारे सृष्टि के लिए होता है।   

जिस तरह सारे प्रकाश या रंग का स्रोत सफेद है। उसी से सारे रंग या वर्ण निकलते हैं। कुछ अलग रंग के निकलते हैं । कुछ कई रंग मिलकर बनते हैं। फिर सारे रंग मिलकर सफेद हो जाते हैं उसी तरह अस्तित्व और आध्यात्मिकता को समझना चाहिए। संभव है जिस तरह रंग का गुण स्वभाव अलग होता है। उसी तरह अस्तित्व धारण करने वाला का गुण स्वभाव अलग होता है और भेद दिखाई देता है। जिस तरह सारे रंग मिलकर सफेद प्रकाश हो जाते हैं उसी तरह सारे अस्तित्व में एकत्व होता है। अद्वैत भावना होती है। अत: अपने प्रेम को महत्व देकर रहना चाहिए।

आने वाले समय में धर्म का आध्यात्मिक नियम ‘एक माँ की करूणा होगी और आध्यात्मिक कर्म मानवीय प्रेम’ होगा।

सौरभ कुमार


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